भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2742, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2742

‘वे महान् तपस्वी हैं। यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओंकी सृष्टि कर लेंगे’ ।। तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः ।। ४० ।। प्रययुस्तत्र यत्रासौ त्रितयज्ञः प्रवर्तते । बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थानपर गये, जहाँ त्रितमुनिका यज्ञ हो रहा था ।। ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः ।। ४१ ।। ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु । दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् ।। ४२ ।। ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् । वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा—‘हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं’ ।। ४१-४२ १/२ ।। अथाब्रवीदृषिर्देवान् पश्यध्वं मा दिवौकसः ।। ४३ ।। अस्मिन् प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् । उस समय महर्षिने उनसे कहा—‘देवताओ! देखो, मैं किस दशामें पड़ा हूँ। इस भयानक कूपमें गिरकर अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ’ ।। ४३ १/२ ।। ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि ।। ४४ ।। मन्त्रयुक्तान् समददत् ते च प्रीतास्तदाभवन् । महाराज! तदनन्तर त्रितने देवताओंको विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए ।। ४४ १/२ ।। ततो यथाविधि प्राप्तान् भागान् प्राप्य दिवौकसः ।। ४५ ।। प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान् यान् मनसेच्छति । विधिपूर्वक प्राप्त हुए उन भागोंको ग्रहण करके प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किया ।। ४५ १/२ ।। स तु वव्रे वरं देवांस्त्रातुमर्हथ मामितः ।। ४६ ।। यश्चैहोपस्पृशेत् कूपे स सोमपगतिं लभेत् । मुनिने देवताओंसे वर माँगते हुए कहा—‘मुझे इस कूपसे आपलोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञमें सोमपान करनेवालोंकी गति प्राप्त हो’ ।। ४६ १/२ ।। तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती ।। ४७ ।। तयोत्क्षिप्तः समुत्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकसः ।

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