महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2743, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! मुनिके इतना कहते ही कुएँमें तरंगमालाओंसे सुशोभित सरस्वती लहरा उठी। उसने अपने जलके वेगसे मुनिको ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने देवताओंका पूजन किया ।। ४७ १/२ ।।
तथेति चोक्त्वा विबुधा जग्मू राजन् यथागताः ।। ४८ ।।
त्रितश्चाभ्यागमत् प्रीतः स्वमेव निलयं तदा ।
नरेश्वर! मुनिके माँगे हुए वरके विषयमें ‘तथास्तु’ कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको ही लौट गये ।। ४८ १/२ ।।
क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा ।। ४९ ।।
उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ।
पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ ।। ५० ।।
तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ।
भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा ।। ५१ ।।
प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः ।
उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा—‘तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये। इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी’ ।। ४९—५१ १/२ ।।
इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते ।। ५२ ।।
तथाभूतावदृश्येतां वचनात् सत्यवादिनः ।
प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादीके वचनसे उसी क्षण भेड़ियेकी शक्लमें दिखायी देने लगे ।। ५२ १/२ ।।
तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः ।। ५३ ।।
दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् ।
अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये ।। ५३ १/२ ।।
उदपानं च तं वीक्ष्य प्रशस्य च पुनः पुनः ।। ५४ ।।
नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा ।। ५५ ।।
उदार चित्तवाले बलरामजी सरस्वती नदीके अन्तर्गत उदपानतीर्थका दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति-प्रशंसा करते हुए वहाँसे विनशनतीर्थमें चले गये ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां त्रिताख्याने षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।