महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2745, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशोऽध्यायः
विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
ततो विनशनं राजन् जगामाथ हलायुधः ।
शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती ॥ १ ॥
तस्मात् तु ऋषयो नित्यं प्राहुर्विनशनेति च ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उदपानतीर्थसे चलकर हलधारी बलराम विनशनतीर्थमें आये, जहाँ (दुष्कर्मपरायण) शूद्रों और आभीरोंके प्रति द्वेष होनेसे सरस्वती नदी विनष्ट (अदृश्य) हो गयी है। इसीलिये ऋषिगण उसे सदा विनशनतीर्थ कहते हैं ॥ १ १/२ ॥
तत्राप्युपस्पृश्य बलः सरस्वत्यां महाबलः ॥ २ ॥
सुभूमिकं ततोऽगच्छत् सरस्वत्यास्तटे वरे ।
महाबली बलराम वहाँ भी सरस्वतीमें आचमन और स्नान करके उसके सुन्दर तटपर स्थित हुए 'सुभूमिक' तीर्थमें गये ॥ २ १/२ ॥
तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः ॥ ३ ॥
क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः ।
उस तीर्थमें गौरवर्ण तथा निर्मल मुखवाली सुन्दरी अप्सराएँ आलस्य त्यागकर सदा नाना प्रकारकी विमल क्रीडाओंद्वारा मनोरंजन करती हैं ॥ ३ १/२ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वा मासि मासि जनेश्वर ॥ ४ ॥
अभिगच्छन्ति तत् तीर्थं पुण्यं ब्राह्मणसेवितम् ।
जनेश्वर! वहाँ उस ब्राह्मणसेवित पुण्यतीर्थमें गन्धर्वोंसहित देवता भी प्रतिमास आया करते हैं ॥ ४ १/२ ॥
तत्रादृश्यन्त गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५ ॥
समेत्य सहिता राजन् यथाप्राप्तं यथासुखम् ।
राजन्! गन्धर्वगण और अप्सराएँ एक साथ मिलकर वहाँ आती और सुखपूर्वक विचरण करती दिखायी देती हैं ॥ ५ १/२ ॥
तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः ॥ ६ ॥