भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2748

अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन् पुरुषर्षभ । एवं ख्यातो नरव्याघ्र लोकेऽस्मिन् स वनस्पतिः ॥ २४ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! वे उन स्वीकृत नियमोंके अनुसार पृथक्-पृथक् विचरते हुए मनुष्योंसे अदृश्य रहकर घूमते थे। नरव्याघ्र! इस प्रकार वह वनस्पति इस विश्वमें विख्यात था ॥ २३-२४ ॥ ततस्तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् । तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे पयस्विनीः ॥ २५ ॥ ताम्रायसानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च । पूजयित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः ॥ २६ ॥ वह वृक्ष सरस्वतीका लोकविख्यात पावन तीर्थ है। यदुश्रेष्ठ बलराम उस तीर्थमें दूध देनेवाली गौओंका दान करके ताँबे और लोहेके बर्तन तथा नाना प्रकारके वस्त्र भी ब्राह्मणोंको दिये। ब्राह्मणोंका पूजन करके वे स्वयं भी तपस्वी मुनियोंद्वारा पूजित हुए ॥ २५-२६ ॥ पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलायुधः । तत्र गत्वा मुनीन् दृष्ट्वा नानावेषधरान् बलः ॥ २७ ॥ आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान् । राजन्! वहाँसे हलधर बलभद्रजी पवित्र द्वैतवनमें आये और वहाँके नाना वेशधारी मुनियोंका दर्शन करके जलमें गोता लगाकर उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यः परिभोगान् सुपुष्कलान् ॥ २८ ॥ ततः प्रायाद् बलो राजन् दक्षिणेन सरस्वतीम् । राजन्! इसी प्रकार विप्रवृन्दको प्रचुर भोगसामग्री अर्पित करके फिर बलरामजी सरस्वतीके दक्षिण तटपर होकर यात्रा करने लगे ॥ २८ ½ ॥ गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः ॥ २९ ॥ धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः । यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् ॥ ३० ॥ महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् । ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश ॥ ३१ ॥ महाराज! इस प्रकार थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु, महायशस्वी धर्मात्मा भगवान् बलराम नागधन्वा नामक तीर्थमें पहुँच गये, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकिका बहुसंख्यक सर्पोंसे घिरा हुआ निवासस्थान है। वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि निवास करते हैं ॥ २९—३१ ॥ यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् । सर्वपन्नगराजनमभ्यषिञ्चन् यथाविधि ॥ ३२ ॥