महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय ।। १५ ।।
सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना।
तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ।। १६ ।।
जनमेजय! वहाँ तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले महात्मा वृद्ध गर्गने सरस्वतीके उस शुभ तीर्थमें कालका ज्ञान, कालकी गति, ग्रहों और नक्षत्रोंके उलट-फेर, दारुण उत्पात तथा शुभ लक्षण—इन सभी बातोंकी जानकारी प्राप्त कर ली थी। उन्हींके नामसे वह तीर्थ गर्गस्रोत कहलाता है ।। १४—१६ ।।
तत्र गर्गं महाभागमृषयः सुव्रता नृप ।
उपासांचक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ।। १७ ।।
सामर्थ्यशाली नरेश्वर! वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने कालज्ञानके लिये सदा महाभाग गर्गमुनिकी उपासना (सेवा) की थी ।। १७ ।।
तत्र गत्वा महाराज बलः श्वेतानुलेपनः ।
विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। १८ ।।
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः ।
नीलवासास्तदागच्छच्छङ्खतीर्थं महायशाः ।। १९ ।।
महाराज! वहाँ जाकर श्वेतचन्दनचर्चित, नीलाम्बरधारी महायशस्वी बलरामजी विशुद्ध अन्त करणवाले महर्षियोंको विधिपूर्वक धन देकर ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ समर्पित करके वहाँसे शंखतीर्थमें चले गये ।। १८-१९ ।।
तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् ।
श्वेतपर्वतसंकाशमृषिसंघैर्निषेवितम् ।। २० ।।
सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली ।
वहाँ तालचिह्नित ध्वजावाले बलवान् बलरामने महाशंख नामक एक वृक्ष देखा, जो महान् मेरुपर्वतके समान ऊँचा और श्वेताचलके समान उज्ज्वल था। उसके नीचे ऋषियोंके समूह निवास करते थे। वह वृक्ष सरस्वतीके तटपर ही उत्पन्न हुआ था ।। २० १/२ ।।
यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः ।। २१ ।।
पिशाचाश्चामितबला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ।
उस वृक्षके आस-पास यक्ष, विद्याधर, अमित तेजस्वी राक्षस, अनन्त बलशाली पिशाच तथा सिद्धगण सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते थे ।। २१ १/२ ।।
ते सर्वे ह्यशनं त्यक्त्वा फलं तस्य वनस्पतेः ।। २२ ।।
व्रतैश्च नियमैश्चैव काले काले स्म भुञ्जते ।
वे सब-के-सब अन्न छोड़कर व्रत और नियमोंका पालन करते हुए समय-समयपर उस वृक्षका ही फल खाया करते थे ।। २२ १/२ ।।
प्राप्तैश्च नियमैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक् पृथक् ।। २३ ।।