महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअश्वैरश्वा गजैर्नागा रथिनो रथिभिः सह ॥ ७४ ॥ संयुक्ताः समदृश्यन्त पत्तयश्चापि पत्तिभिः । घोड़ोंसे घोड़े, हाथियोंसे हाथी, रथियोंसे रथी और पैदलोंसे पैदल जूझते दिखायी दे रहे थे ॥ ७४ १/२ ॥ एवं सुकलिलं युद्धमासीत् क्रव्यादहर्षणम् । महद्भिस्तैरभीतानां यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥ ७५ ॥ इस प्रकार उन निर्भीक सैनिकोंका महान् शक्तिशाली विपक्षी योद्धाओंके साथ अत्यन्त घमासान युद्ध हो रहा था, जो कच्चा मांस खानेवाले पशु-पक्षियों तथा पिशाचोंके हर्षकी वृद्धि और यमराजके राष्ट्रकी समृद्धि करनेवाला था ॥ ७५ १/२ ॥ ततो हता नररथवाजिकुञ्जरै- रनेकशो द्विपरथपत्तिवाजिनः । गजैर्गजा रथिभिरुदायुधा रथा हयैर्हयाः पत्तिगणैश्च पत्तयः ॥ ७६ ॥ उस समय पैदल, रथी, घुड़सवार और हाथीसवारोंके द्वारा बहुत-से हाथीसवार, रथी, पैदल और घुड़सवार मारे गये। हाथियोंने हाथियोंको, रथियोंने शस्त्र उठाये हुए रथियोंको, घुड़सवारोंने घुड़सवारोंको और पैदल योद्धाओंने पैदल योद्धाओंको मार गिराया ॥ ७६ ॥ रथैर्द्विपा द्विरदवरैर्महाहया हयैर्नरा वररथिभिश्च वाजिनः । निरस्तजिह्वादशनेक्षणाः क्षितौ क्षयं गताः प्रमथितवर्मभूषणाः ॥ ७७ ॥ रथियोंने हाथियोंको, गजराजोंने बड़े-बड़े घोड़ोंको, घुड़सवारोंने पैदलोंको तथा श्रेष्ठ रथियोंने घुड़सवारोंको धराशायी कर दिया। उनकी जिह्वा, दाँत और नेत्र—ये सब बाहर निकल आये थे। कवच और आभूषण टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े थे। ऐसी अवस्थामें वे सब योद्धा पृथ्वीपर गिरकर नष्ट हो गये थे ॥ ७७ ॥ तथा परैर्बहुकरणैर्वरैरायुधै- र्हता गताः प्रतिभयदर्शनाः क्षितिम् । विपोथिता हयगजपादताडिता भृशाकुला रथमुखनेमिभिः क्षताः ॥ ७८ ॥ शत्रुओंके पास बहुत-से साधन थे। उनके हाथमें उत्तम अस्त्र-शस्त्र थे। उनके द्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े हुए सैनिक बड़े भयंकर दिखायी देते थे। कितने ही योद्धा हाथियों और घोड़ोंके पैरोंसे आहत होकर धरतीपर गिर पड़ते थे। कितने ही बड़े-बड़े रथोंके पहियोंसे कुचलकर क्षत-विक्षत हो अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ॥ ७८ ॥ प्रमोदने श्वापदपक्षिरक्षसां