महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदाय कर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या नदन् रणे ।
तदनन्तर पाञ्चालराजकुमार धृष्टद्युम्नने अपने रथपर बैठकर दूसरा धनुष ले रणक्षेत्रमें गर्जना करते हुए तिहत्तर बाणोंद्वारा कर्णको बींध डाला ॥ ६६ १/२ ॥
शैनेयोऽप्यन्यदादाय धनुरिन्दुसमद्युतिः ॥ ६७ ॥
सूतपुत्रं चतुःषष्ट्या विद्ध्वा सिंह इवानदत् ।
तत्पश्चात् चन्द्रमाके समान कान्तिमान् सात्यकिने भी दूसरा धनुष हाथमें लेकर सूतपुत्र कर्णको चौंसठ बाणोंसे घायल करके सिंहके समान गर्जना की ॥ ६७ १/२ ॥
भल्लाभ्यां साधुमुक्ताभ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम् ॥ ६८ ॥
पुनः कर्णं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
इसके बाद उन्होंने अच्छी तरह छोड़े हुए दो भल्लोंद्वारा कर्णके धनुषको काटकर पुनः तीन बाणोंद्वारा कर्णकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें भी चोट पहुँचायी ॥
ततो दुर्योधनो द्रोणो राजा चैव जयद्रथः ॥ ६९ ॥
निमज्जमानं राधेयमुज्जह्रुः सात्यकार्णवात् ।
तत्पश्चात् दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा राजा जयद्रथने डूबते हुए राधानन्दन कर्णका सात्यकिरूपी समुद्रसे उद्धार किया ॥ ६९ १/२ ॥
पत्यश्वरथमातङ्गास्त्वदीयाः शतशोऽपरे ॥ ७० ॥
कर्णमेवाभ्यधावन्त त्रास्यमानाः प्रहारिणः ।
उस समय आपकी सेनाके अन्य सैकड़ों पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा सात्यकिसे संत्रस्त होकर कर्णके ही पीछे दौड़े गये ॥ ७० १/२ ॥
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सौभद्रोऽर्जुन एव च ॥ ७१ ॥
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिं जुगुपू रणे ।
उधर धृष्टद्युम्न, भीमसेन, अभिमन्यु, अर्जुन, नकुल तथा सहदेवने रणक्षेत्रमें सात्यकिका संरक्षण आरम्भ किया ॥ ७१ १/२ ॥
एवमेष महारौद्रः क्षयार्थं सर्वधन्विनाम् ॥ ७२ ॥
तावकानां परेषां च त्यक्त्वा प्राणानभूद् रणः ।
महाराज! इस प्रकार आपके तथा शत्रुपक्षके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके विनाशके लिये उनमें परस्पर प्राणोंकी परवा न करके अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ७२ १/२ ॥
पदातिरथनागाश्च गजाश्वरथपत्तिभिः ॥ ७३ ॥
रथिनो नागपत्त्यश्चै रथपत्ती रथद्विपैः ।
पैदल, रथ, हाथी और घोड़े क्रमशः हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंके साथ युद्ध करने लगे। रथी हाथियों, पैदलों और घोड़ोंके साथ भिड़ गये। रथी और पैदल सैनिक रथियों और हाथियोंका सामना करने लगे ॥ ७३ १/२ ॥