महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2763, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनचत्वारिंशाेऽध्यायः
औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा
वैशम्पायन उवाच
उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिनः ।
तथा मङ्कणके प्रीतिं शुभां चक्रे हलायुधः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उस सप्तसारस्वत-तीर्थमें रहकर हलधर बलरामजीने आश्रमवासी ऋषियोंका पूजन किया और मंकणक मुनिपर अपनी उत्तम प्रीतिका परिचय दिया ॥ १ ॥
दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनीं तामुपोष्य च ।
पूजितो मुनिसङ्घैश्च प्रातरुत्थाय लाङ्गली ॥ २ ॥
अनुज्ञाप्य मुनीन् सर्वान् स्पृष्ट्वा तोयं च भारत ।
प्रययौ त्वरितो रामस्तीर्थहेतोर्महाबलः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे उस रात्रिमें निवास करनेके पश्चात् प्रातःकाल उठकर मुनिमण्डलीसे सम्मानित हो महाबली लांगलधारी बलरामने पुनः तीर्थके जलमें स्नान किया और सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंकी आज्ञा ले अन्य तीर्थोंमें जानेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दिया ॥ २-३ ॥
ततस्त्वौशनसं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।
कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ॥ ४ ॥
महता शिरसा राजन् ग्रस्तजङ्घो महोदरः ।
राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा ॥ ५ ॥
तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है। महाराज! पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था। उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था। वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे ॥ ४-५ ॥
तत्र पूर्वं तपस्तप्तं काव्येन सुमहात्मना ।
यत्रास्य नीतिरखिला प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ६ ॥
महात्मा शुक्राचार्यने वहीं पहले तप किया था, जिससे उनके हृदयमें सम्पूर्ण नीति-विद्या स्फुरित हुई थी ॥ ६ ॥
यत्रस्थश्चिन्तयामास दैत्यदानवविग्रहम् ।