महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2764, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत् प्राप्य च बलो राजंस्तीर्थप्रवरमुत्तमम् ॥ ७ ॥ विधिवद् वै ददौ वित्तं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । वहीं रहकर उन्होंने दैत्यों अथवा दानवोंके युद्धके विषयमें विचार किया था। राजन्! उस श्रेष्ठ तीर्थमें पहुँचकर बलरामजीने महात्मा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धनका दान दिया था॥ ७ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
कपालमोचनं ब्रह्मन् कथं यत्र महामुनिः ॥ ८ ॥ मुक्तः कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना । जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! उस तीर्थका नाम कपालमोचन कैसे हुआ, जहाँ महामुनि महोदरको छुटकारा मिला था? उनकी जाँघमें वह सिर कैसे और किस कारणसे चिपक गया था? ॥ ८ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
पुरा वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥ वसता राजशार्दूल राक्षसान् शमयिष्यता । जनस्थाने शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ १० ॥ क्षुरेण शितधारेण उत्पपात महावने । महोदरस्य तल्लग्नं जंघायां वै यदृच्छया ॥ ११ ॥ वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत् तदा । वैशम्पायनजीने कहा—नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, रघुकुलतिलक महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें रहते समय जब राक्षसोंके संहारका विचार किया, तब तीखी धारवाले धुरसे जनस्थानमें उस दुरात्मा राक्षसका मस्तक काट दिया। वह कटा हुआ मस्तक उस महान् वनमें ऊपरको उछला और दैवयोगसे वनमें विचरते हुए महोदर मुनिकी जाँघमें जा लगा। नरेश्वर! उस समय उनकी हड्डी छेदकर वह भीतरतक घुस गया॥ ९—११ १/२ ॥
स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह ॥ १२ ॥ अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च । उस मस्तकके चिपक जानेसे वे महाबुद्धिमान् ब्राह्मण किसी तीर्थ या देवालयमें सुगमतापूर्वक आ-जा नहीं सकते थे॥ १२ १/२ ॥
स पूतिना विस्रवता वेदनार्तो महामुनिः ॥ १३ ॥ जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां चेति नः श्रुतम् । उस मस्तकसे दुर्गन्धयुक्त पीब बहती रहती थी और महामुनि महोदर वेदनासे पीड़ित हो गये थे। हमने सुना है कि मुनिने किसी तरह भूमण्डलके सभी तीर्थोंकी यात्रा की॥
स गत्वा सरितः सर्वाः समुद्रांश्च महातपाः ॥ १४ ॥