महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2765, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् । आप्लुत्य सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान् ॥ १५ ॥ उन महातपस्वी महर्षिने सम्पूर्ण सरिताओं और समुद्रोंकी यात्रा करके वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा मुनियोंसे वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके भी वे उस कपालसे छुटकारा न पा सके ॥ १४-१५ ॥
स तु शुश्राव विप्रेन्द्र मुनीनां वचनं महत् । सरस्वत्यास्तीर्थवरं ख्यातमौशनसं तदा ॥ १६ ॥ सर्वपापप्रशमनं सिद्धिक्षेत्रमनुत्तमम् । विप्रवर! उन्होंने मुनियोंके मुखसे यह महत्त्वपूर्ण बात सुनी कि 'सरस्वतीका श्रेष्ठ तीर्थ जो औशनस नामसे विख्यात है, सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला तथा परम उत्तम सिद्धिक्षेत्र है' ॥ १६ १/२ ॥
स तु गत्वा ततस्तत्र तीर्थमौशनसं द्विजः ॥ १७ ॥ तत औशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा । तच्छिरश्चरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले तदा ॥ १८ ॥ तदनन्तर वे ब्रह्मर्षि वहाँ औशनसतीर्थमें गये और उसके जलसे आचमन एवं स्नान किया। उसी समय वह कपाल उनके चरण (जाँघ)-को छोड़कर पानीके भीतर गिर पड़ा ॥ १७-१८ ॥
विमुक्तस्तेन शिरसा परं सुखमवाप ह । स चाप्यन्तर्जले मूर्धा जगामादर्शनं विभो ॥ १९ ॥ प्रभो! उस मस्तक या कपालसे मुक्त होनेपर महोदर मुनिको बड़ा सुख मिला। साथ ही वह मस्तक भी (जो उनकी जाँघसे छूटकर गिरा था) पानीके भीतर अदृश्य हो गया ॥ १९ ॥
ततः स विशिरा राजन् पूतात्मा वीतकल्मषः । आजगामाश्रमं प्रीतः कृतकृत्यो महोदरः ॥ २० ॥ राजन्! उस कपालसे मुक्त हो निष्पाप एवं पवित्र अन्तःकरणवाले महोदर मुनि कृतकृत्य हो प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २० ॥
सोऽथ गत्वाऽऽश्रमं पुण्यं विप्रमुक्तो महातपाः । कथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् ॥ २१ ॥ संकटसे मुक्त हुए उन महातपस्वी मुनिने अपने पवित्र आश्रमपर जाकर वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा ऋषियोंसे अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २१ ॥
ते श्रुत्वा वचनं तस्य ततस्तीर्थस्य मानद । कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः ॥ २२ ॥