महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2766, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमानद! तदनन्तर वहाँ आये हुए महर्षियोंने महोदर मुनिकी बात सुनकर उस तीर्थका नाम कपालमोचन रख दिया ॥ २२ ॥ स चापि तीर्थप्रवरं पुनर्गत्वा महानृषिः । पीत्वा पयः सुविपुलं सिद्धिमायात् तदा मुनिः ॥ २३ ॥ इसके बाद महर्षि महोदर पुनः उस श्रेष्ठ तीर्थमें गये और वहाँका प्रचुर जल पीकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए ॥ २३ ॥ तत्र दत्त्वा बहून् दायान् विप्रान् सम्पूज्य माधवः । जगाम वृष्णिप्रवरो रुषङ्गोराश्रमं तदा ॥ २४ ॥ वृष्णिवंशावतंस बलरामजीने वहाँ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें बहुत धनका दान किया। इसके बाद वे रुषंगु मुनिके आश्रमपर गये ॥ २४ ॥ यत्र तप्तं तपो घोरमार्ष्टिषेणेन भारत । ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनिः ॥ २५ ॥ भरतनन्दन! वहीं आर्ष्टिषेतो मुनिने घोर तपस्या की थी और वहीं महामुनि विश्वामित्रने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ २५ ॥ सर्वकामसमृद्धं च तदाश्रमपदं महत् । मुनिभिर्ब्राह्मणैश्चैव सेवितं सर्वदा विभो ॥ २६ ॥ प्रभो! वह महान् आश्रम सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे सम्पन्न है। वहाँ बहुत-से मुनि और ब्राह्मण सदा निवास करते हैं ॥ २६ ॥ ततो हलधरः श्रीमान् ब्राह्मणैः परिवारितः । जगाम तत्र राजेन्द्र रुषङ्गुस्तनुमत्यजत् ॥ २७ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रीमान् हलधर ब्राह्मणोंसे घिरकर उस स्थानपर गये, जहाँ रुषंगुने अपना शरीर छोड़ा था ॥ २७ ॥ रुषङ्गुर्ब्राह्मणो वृद्धस्तपोनित्यश्च भारत । देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा ॥ २८ ॥ ततः सर्वानुपादाय तनयान् वै महातपाः । रुषङ्गुरब्रवीत् तत्र नयध्वं मां पृथूदकम् ॥ २९ ॥ भारत! बूढ़े ब्राह्मण रुषंगु सदा तपस्यामें संलग्न रहते थे। एक समय उन महातपस्वी रुषंगु मुनिने शरीर त्याग देनेका विचार करके बहुत कुछ सोचकर अपने सभी पुत्रोंको बुलाया और उनसे कहा—'मुझे पृथूदक तीर्थमें ले चलो' ॥ २८-२९ ॥ विज्ञायातीतवयसं रुषङ्गुं ते तपोधनाः । तं च तीर्थमुपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ ३० ॥ उन तपस्वी पुत्रोंने तपोधन रुषंगुको अत्यन्त वृद्ध जानकर उन्हें सरस्वतीके उस उत्तम तीर्थमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥