महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंके अभ्युदयसे वह मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया था। द्रोणाचार्यके प्रति उसके हृदयमें प्रेम था। उसे अपने शौर्यपर अभिमान भी था। अतः अत्यन्त कुपित हो बातचीतमें कुशल राजा दुर्योधनने समस्त योद्धाओंके सुनते हुए इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।
नूनं वयं वध्यपक्षे भवतो द्विजसत्तम ।
तथा हि नाग्रहीः प्राप्तं समीपेऽद्य युधिष्ठिरम् ।। ७ ।।
'द्विजश्रेष्ठ! निश्चय ही हमलोग आपकी दृष्टिमें शत्रुवर्गके अन्तर्गत हैं। यही कारण है कि आज आपने अत्यन्त निकट आनेपर भी राजा युधिष्ठिरको नहीं पकड़ा है ।। ७ ।।
इच्छतस्ते न मुच्येत चक्षुःप्राप्तो रणे रिपुः ।
जिघृक्षतो रक्ष्यमाणः सामरैरपि पाण्डवैः ।। ८ ।।
'रणक्षेत्रमें कोई शत्रु आपके नेत्रोंके समक्ष आ जाय और उसे आप पकड़ना चाहें तो सम्पूर्ण देवताओंके साथ रहे सारे पाण्डव उसकी रक्षा क्यों न कर रहे हों, निश्चय ही वह आपसे छूटकर नहीं जा सकता ।। ८ ।।
वरं दत्त्वा मम प्रीतः पश्चाद् विकृतवानसि ।
आशाभङ्गं न कुर्वन्ति भक्तस्यार्याः कथंचन ।। ९ ।।
'आपने प्रसन्न होकर पहले तो मुझे वर दिया और पीछे उसे उलट दिया; परंतु श्रेष्ठ पुरुष किसी प्रकार भी अपने भक्तकी आशा भंग नहीं करते हैं' ।। ९ ।।
ततोऽप्रीतस्तथोक्तः सन् भारद्वाजोऽब्रवीन्नृपम् ।
नाईसे मां तथा ज्ञातुं घटमानं तव प्रिये ।। १० ।।
दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणाचार्यको तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई। वे दुःखी होकर राजासे इस प्रकार बोले—'राजन्! तुमको मुझे इस प्रकार प्रतिज्ञा भंग करनेवाला नहीं समझना चाहिये। मैं अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हारा प्रिय करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ ।। १० ।।
ससुरासुरगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः ।
नालं लोका रणे जेतुं पाल्यमानं किरीटिना ।। ११ ।।