महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘परंतु एक बात याद रखो, किरीटधारी अर्जुन रणक्षेत्रमें जिसकी रक्षा कर रहे हों, उसे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोक भी नहीं जीत सकते ।। ११ ।। विश्वसृग् यत्र गोविन्दः पृतनानीस्तथार्जुनः । तत्र कस्य बलं क्रामेदन्यत्र त्र्यम्बकात् प्रभोः ।। १२ ।। ‘जहाँ जगत्स्रष्टा भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुन सेनानायक हों, वहाँ भगवान् शंकरके सिवा दूसरे किस पुरुषका बल काम कर सकता है ।। १२ ।। सत्यं तात ब्रवीम्यद्य नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । अद्यैकं प्रवरं कंचित् पातयिष्ये महारथम् ।। १३ ।। ‘तात! आज मैं एक सच्ची बात कहता हूँ, यह कभी झूठी नहीं हो सकती। आज मैं पाण्डवपक्षके किसी श्रेष्ठ महारथीको अवश्य मार गिराऊँगा ।। १३ ।। तं च व्यूहं विधास्यामि योऽभेद्यस्त्रिदशैरपि । योगेन केनचिद् राजन्नर्जुनस्त्वपनीयताम् ।। १४ ।। ‘राजन्! आज उस व्यूहका निर्माण करूँगा, जिसे देवता भी तोड़ नहीं सकते; परंतु किसी उपायसे अर्जुनको यहाँसे दूर हटा दो ।। १४ ।। न ह्यज्ञातमसाध्यं वा तस्य संख्येऽस्ति किंचन । तेन ह्युपात्तं सकलं सर्वज्ञानमितस्ततः ।। १५ ।। ‘युद्धके सम्बन्धमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो अर्जुनके लिये अज्ञात अथवा असाध्य हो। उन्होंने इधर-उधरसे युद्धविषयक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है’ ।। १५ ।। द्रोणेन व्याहृते त्वेवं संशप्तकगणाः पुनः ।