भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 280

आह्वयन्नर्जुनं संख्ये दक्षिणामभितो दिशम् ॥ १६ ॥
द्रोणाचार्यके ऐसा कहनेपर पुनः संशप्तकगणोंने दक्षिण दिशामें जा अर्जुनको युद्धके लिये ललकारा ॥ १६ ॥
ततोऽर्जुनस्याथ परैः सार्धं समभवद् रणः ।
तादृशो यादृशो नान्यः श्रुतो दृष्टोऽपि वा क्वचित् ॥ १७ ॥
वहाँ अर्जुनका शत्रुओंके साथ ऐसा घोर संग्राम हुआ, जैसा दूसरा कोई कहीं न तो देखा गया है और न सुना ही गया है ॥ १७ ॥
तत्र द्रोणेन विहितो व्यूहो राजन् व्यरोचत ।
चरन् मध्यंदिने सूर्यः प्रतपन्निव दुर्द्दशः ॥ १८ ॥
राजन्! उस समय वहाँ द्रोणाचार्यने जिस व्यूहका निर्माण किया, वह मध्याह्नकालमें विचरते हुए सूर्यकी भाँति शत्रुओंको संताप देता-सा सुशोभित हो रहा था। उसे जीतना तो दूर रहा, उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी अत्यन्त कठिन था ॥ १८ ॥
तं चाभिमन्युर्वचनात् पितुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
बिभेद दुर्भिदं संख्ये चक्रव्यूहमनेकधा ॥ १९ ॥
भारत! यद्यपि उस चक्रव्यूहका भेदन करना अत्यन्त दुष्कर कार्य था तो भी वीर अभिमन्युने अपने ताऊ युधिष्ठिरकी आज्ञासे उस व्यूहका बारंबार भेदन किया ॥ १९ ॥
स कृत्वा दुष्करं कर्म हत्वा वीरान् सहस्रशः ।
षट्सु वीरेषु संसक्तो दौःशासनेर्वशं गतः ॥ २० ॥
अभिमन्युने वह दुष्कर कर्म करके सहस्रों वीरोंका वध किया और अन्तमें छः वीरोंके साथ अकेला ही उलझकर दुःशासनपुत्रके हाथसे मारा गया ॥ २० ॥
सौभद्रः पृथिवीपाल जहौ प्राणान् परंतपः ।
वयं परमसंहृष्टाः पाण्डवाः शोककर्शिताः ।
सौभद्रे निहते राजन्नवहारमकुर्महि ॥ २१ ॥
भूपाल! शत्रुओंको संताप देनेवाले सुभद्राकुमारने जब प्राण त्याग दिये, उस समय हमलोगोंको बड़ा हर्ष हुआ और पाण्डव शोकसे व्याकुल हो गये। राजन्! सुभद्रा-कुमारके मारे जानेपर हमलोगोंने युद्ध बंद कर दिया ॥ २१ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

पुत्रं पुरुषसिंहस्य संजयाप्राप्तयौवनम् ।
रणे विनिहतं श्रुत्वा भृशं मे दीर्यते मनः ॥ २२ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! पुरुषसिंह अर्जुनका वह पुत्र अभी युवावस्थामें भी नहीं पहुँचा था। उसे युद्धमें मारा गया सुनकर मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण हो रहा है ॥ २२ ॥
दारुणः क्षत्रधर्मोऽयं विहितो धर्मकर्तृभिः ।

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