महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2792, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ४६ ॥ यत्रायजद् राजसूयेन सोमः साक्षात् पुरा विधिवत् पार्थिवेन्दः । अत्रिर्धीमान् विप्रमुख्यो बभूव होता यस्मिन् क्रतुमुख्ये महात्मा ॥ ४७ ॥ जहाँ पूर्वकालमें साक्षात् राजाधिराज सोमने विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया था। उस श्रेष्ठ यज्ञमें बुद्धिमान् विप्रवर महात्मा अत्रिने होताका कार्य किया था ॥ यस्यान्तेऽभूत् सुमहद् दानवानां दैतेयानां राक्षसानां च देवैः । यस्मिन् युद्धं तारकाख्यं सुतीव्रं यत्र स्कन्दस्तारकाख्यं जघान ॥ ४८ ॥ उस यज्ञके अन्तमें देवताओंके साथ दानवों, दैत्यों तथा राक्षसोंका महान् एवं भयंकर तारकामय संग्राम हुआ था, जिसमें स्कन्दने तारकासुरका वध किया था ॥ सैनापत्यं लब्धवान् देवतानां महासेनो यत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाच्चैवं न्यवसत् कार्तिकेयः सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ॥ ४९ ॥ उसीमें दैत्यविनाशक महासेन कार्तिकेयने देवताओंका सेनापतित्व ग्रहण किया था। जहाँ वह पाकड़का श्रेष्ठ वृक्ष है, वहाँ साक्षात् कुमार कार्तिकेय इस तीर्थमें सदा निवास करते हैं ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥