महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब लोकगुरु ब्रह्माने उनसे कहा—'देवेन्द्र! अरुणा तीर्थ पाप-भयको दूर करनेवाला है। तुम वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणाके जलमें स्नान करो।। ३९ १/२ ।।
एषा पुण्यजला शक्र कृता मुनिभिरेव तु।। ४०।।
निगूढमस्यागमनमिहासीत् पूर्वमेव तु।
ततोऽभ्येत्यारुणां देवीं प्लावयामास वारिणा।। ४१।।
'शक्र! महर्षियोंने इस अरुणाके जलको परम पवित्र बना दिया है। इस तीर्थमें पहले ही गुप्तरूपसे उसका आगमन हो चुका था, फिर सरस्वतीने निकट आकर अरुणादेवीको अपने जलसे आप्लावित कर दिया।।
सरस्वत्यारुणायाश्च पुण्योऽयं संगमो महान्।
इह त्वं यज देवेन्द्र दद दानान्यनेकणः।। ४२।।
अत्राप्लुत्य सुघोरात् त्वं पातकाद् विप्रमोक्ष्यसे।
'देवेन्द्र! सरस्वती और अरुणाका यह संगम महान् पुण्यदायक तीर्थ है। तुम यहाँ यज्ञ करो और अनेक प्रकारके दान दो। फिर उसमें स्नान करके तुम भयानक पातकसे मुक्त हो जाओगे'।। ४२ १/२ ।।
इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय।। ४३।।
इष्ट्वा यथावद् बलभिदरुणायामुपास्पृशत्।
स मुक्तः पाप्मना तेन ब्रह्मवध्याकृतेन च।। ४४।।
जगाम संहृष्टमनास्त्रिदिवं त्रिदशेश्वरः।
जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सरस्वतीके कुंजमें विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणामें स्नान किया। फिर ब्रह्महत्याजनित पापसे मुक्त हो देवराज इन्द्र हर्षोत्फुल्ल हृदयसे स्वर्गलोकमें चले गये।। ४३-४४ १/२ ।।
शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत।
लोकान् कामदुघान् प्राप्तमक्षयान् राजसत्तम।। ४५।।
भारत! नृपश्रेष्ठ! नमुचिका वह मस्तक भी उसी तीर्थमें गोता लगाकर मनोवांछित फल देनेवाले अक्षय लोकोंमें चला गया।। ४५।।
वैशम्पायन उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य बलो महात्मा
दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि।
अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा
जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम्।। ४६।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पारमार्थिक कार्य करनेवाले महात्मा बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान करके नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान करके धर्मका फल पाकर सोमके