महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2790, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिमर्थं भगवान् शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ।
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! भगवान् इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगा तथा वे किस प्रकार इस तीर्थमें स्नान करके पापमुक्त हुए थे? ॥ ३२ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर ॥ ३३ ॥
यथा बिभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! पूर्वकालमें इन्द्रने नमुचिके साथ अपनी की हुई प्रतिज्ञाको जिस प्रकार तोड़ डाला था, वह सारी कथा जैसे घटित हुई थी, तुम यथार्थरूपसे सुनो ॥ ३३ १/२ ॥
नमुचिर्वासवाद् भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् ॥ ३४ ॥
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत् समयं चेदमब्रवीत् ।
न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि ॥ ३५ ॥
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे ।
पहलेकी बात है, नमुचि इन्द्रके भयसे डरकर सूर्यकी किरणोंमें समा गया था। तब इन्द्रने उसके साथ मित्रता कर ली और यह प्रतिज्ञा की ‘असुरश्रेष्ठ! मैं न तो तुम्हें गीले हथियारसे मारूँगा न सूखेसे। न दिनमें मारूँगा न रातमें। सखे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर यह बात तुमसे कहता हूँ’ ॥ ३४-३५ १/२ ॥
एवं स कृत्वा समयं दृष्ट्वा नीहारमीश्वरः ॥ ३६ ॥
चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः ।
राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके भी देवराज इन्द्रने चारों ओर कुहासा छाया हुआ देख पानीके फेनसे नमुचिका सिर काट लिया ॥ ३६ १/२ ॥
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वियात् ॥ ३७ ॥
भो भो मित्रघ्न पापेति ब्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ।
नमुचिका वह कटा हुआ मस्तक इन्द्रके पीछे लग गया। वह उनके पास जाकर बारंबार कहने लगा, ‘ओ मित्रघाती पापात्मा इन्द्र! तू कहाँ जाता है?’ ॥ ३७ १/२ ॥
एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
पितामहाय संतप्त एतमर्थं न्यवेदयत् ।
इस प्रकार उस मस्तकके द्वारा बारंबार पूर्वोक्त बात पूछी जानेपर अत्यन्त संतप्त हुए इन्द्रने ब्रह्माजीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ३८ १/२ ॥
तमब्रवील्लोकगुरुररुणायां यथाविधि ॥ ३९ ॥
इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र तीर्थे पापभयापहे ।