महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
किमर्थं भगवान् शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ।
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! भगवान् इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप कैसे लगा तथा वे किस प्रकार इस तीर्थमें स्नान करके पापमुक्त हुए थे? ॥ ३२ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर ॥ ३३ ॥
यथा बिभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनेश्वर! पूर्वकालमें इन्द्रने नमुचिके साथ अपनी की हुई प्रतिज्ञाको जिस प्रकार तोड़ डाला था, वह सारी कथा जैसे घटित हुई थी, तुम यथार्थरूपसे सुनो ॥ ३३ १/२ ॥
नमुचिर्वासवाद् भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् ॥ ३४ ॥
तेनेन्द्रः सख्यमकरोत् समयं चेदमब्रवीत् ।
न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि ॥ ३५ ॥
वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे ।
पहलेकी बात है, नमुचि इन्द्रके भयसे डरकर सूर्यकी किरणोंमें समा गया था। तब इन्द्रने उसके साथ मित्रता कर ली और यह प्रतिज्ञा की ‘असुरश्रेष्ठ! मैं न तो तुम्हें गीले हथियारसे मारूँगा न सूखेसे। न दिनमें मारूँगा न रातमें। सखे! मैं सत्यकी सौगन्ध खाकर यह बात तुमसे कहता हूँ’ ॥ ३४-३५ १/२ ॥
एवं स कृत्वा समयं दृष्ट्वा नीहारमीश्वरः ॥ ३६ ॥
चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः ।
राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके भी देवराज इन्द्रने चारों ओर कुहासा छाया हुआ देख पानीके फेनसे नमुचिका सिर काट लिया ॥ ३६ १/२ ॥
तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वियात् ॥ ३७ ॥
भो भो मित्रघ्न पापेति ब्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ।
नमुचिका वह कटा हुआ मस्तक इन्द्रके पीछे लग गया। वह उनके पास जाकर बारंबार कहने लगा, ‘ओ मित्रघाती पापात्मा इन्द्र! तू कहाँ जाता है?’ ॥ ३७ १/२ ॥
एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः ॥ ३८ ॥
पितामहाय संतप्त एतमर्थं न्यवेदयत् ।
इस प्रकार उस मस्तकके द्वारा बारंबार पूर्वोक्त बात पूछी जानेपर अत्यन्त संतप्त हुए इन्द्रने ब्रह्माजीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ३८ १/२ ॥
तमब्रवील्लोकगुरुररुणायां यथाविधि ॥ ३९ ॥
इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र तीर्थे पापभयापहे ।
तब लोकगुरु ब्रह्माने उनसे कहा—'देवेन्द्र! अरुणा तीर्थ पाप-भयको दूर करनेवाला है। तुम वहाँ विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणाके जलमें स्नान करो।। ३९ १/२ ।।
एषा पुण्यजला शक्र कृता मुनिभिरेव तु।। ४०।।
निगूढमस्यागमनमिहासीत् पूर्वमेव तु।
ततोऽभ्येत्यारुणां देवीं प्लावयामास वारिणा।। ४१।।
'शक्र! महर्षियोंने इस अरुणाके जलको परम पवित्र बना दिया है। इस तीर्थमें पहले ही गुप्तरूपसे उसका आगमन हो चुका था, फिर सरस्वतीने निकट आकर अरुणादेवीको अपने जलसे आप्लावित कर दिया।।
सरस्वत्यारुणायाश्च पुण्योऽयं संगमो महान्।
इह त्वं यज देवेन्द्र दद दानान्यनेकणः।। ४२।।
अत्राप्लुत्य सुघोरात् त्वं पातकाद् विप्रमोक्ष्यसे।
'देवेन्द्र! सरस्वती और अरुणाका यह संगम महान् पुण्यदायक तीर्थ है। तुम यहाँ यज्ञ करो और अनेक प्रकारके दान दो। फिर उसमें स्नान करके तुम भयानक पातकसे मुक्त हो जाओगे'।। ४२ १/२ ।।
इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय।। ४३।।
इष्ट्वा यथावद् बलभिदरुणायामुपास्पृशत्।
स मुक्तः पाप्मना तेन ब्रह्मवध्याकृतेन च।। ४४।।
जगाम संहृष्टमनास्त्रिदिवं त्रिदशेश्वरः।
जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रने सरस्वतीके कुंजमें विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणामें स्नान किया। फिर ब्रह्महत्याजनित पापसे मुक्त हो देवराज इन्द्र हर्षोत्फुल्ल हृदयसे स्वर्गलोकमें चले गये।। ४३-४४ १/२ ।।
शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत।
लोकान् कामदुघान् प्राप्तमक्षयान् राजसत्तम।। ४५।।
भारत! नृपश्रेष्ठ! नमुचिका वह मस्तक भी उसी तीर्थमें गोता लगाकर मनोवांछित फल देनेवाले अक्षय लोकोंमें चला गया।। ४५।।
वैशम्पायन उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य बलो महात्मा
दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि।
अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा
जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम्।। ४६।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पारमार्थिक कार्य करनेवाले महात्मा बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान करके नाना प्रकारकी वस्तुओंका दान करके धर्मका फल पाकर सोमके
महान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ४६ ॥ यत्रायजद् राजसूयेन सोमः साक्षात् पुरा विधिवत् पार्थिवेन्दः । अत्रिर्धीमान् विप्रमुख्यो बभूव होता यस्मिन् क्रतुमुख्ये महात्मा ॥ ४७ ॥ जहाँ पूर्वकालमें साक्षात् राजाधिराज सोमने विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया था। उस श्रेष्ठ यज्ञमें बुद्धिमान् विप्रवर महात्मा अत्रिने होताका कार्य किया था ॥ यस्यान्तेऽभूत् सुमहद् दानवानां दैतेयानां राक्षसानां च देवैः । यस्मिन् युद्धं तारकाख्यं सुतीव्रं यत्र स्कन्दस्तारकाख्यं जघान ॥ ४८ ॥ उस यज्ञके अन्तमें देवताओंके साथ दानवों, दैत्यों तथा राक्षसोंका महान् एवं भयंकर तारकामय संग्राम हुआ था, जिसमें स्कन्दने तारकासुरका वध किया था ॥ सैनापत्यं लब्धवान् देवतानां महासेनो यत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाच्चैवं न्यवसत् कार्तिकेयः सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ॥ ४९ ॥ उसीमें दैत्यविनाशक महासेन कार्तिकेयने देवताओंका सेनापतित्व ग्रहण किया था। जहाँ वह पाकड़का श्रेष्ठ वृक्ष है, वहाँ साक्षात् कुमार कार्तिकेय इस तीर्थमें सदा निवास करते हैं ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
जनमेजयने कहा—द्विजश्रेष्ठ! आपने सरस्वतीका यह प्रभाव बताया है। ब्रह्मन्! अब कुमार कार्तिकेयके अभिषेकका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
कुमार कार्तिकेयका प्राकट्य और उनके अभिषेककी तैयारी
जनमेजय उवाच
सरस्वत्याः प्रभावोऽयमुक्तस्ते द्विजसत्तम ।
कुमारस्याभिषेकं तु ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपने सरस्वतीका यह प्रभाव बताया है। ब्रह्मन्! अब कुमार कार्तिकेयके अभिषेकका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
यस्मिन् देशे च काले च यथा च वदतां वर ।
यैश्चाभिषिक्तो भगवान् विधिना येन च प्रभुः ॥ २ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस देश और कालमें किन लोगोंने किस विधिसे किस प्रकार शक्तिशाली भगवान् स्कन्दका अभिषेक किया? ॥ २ ॥
स्कन्दो यथा च दैत्यानामकरोत् कदनं महत् ।
तथा मे सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
स्कन्दने जिस प्रकार दैत्योंका महान् संहार किया हो, वह सब उसी तरह मुझे बताइये; क्योंकि मेरे मनमें इसे सुननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
कुरुवंशस्य सदृशं कौतूहलमिदं तव ।
हर्षमुत्पादयत्येव वचो मे जनमेजय ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**जनमेजय! तुम्हारा यह कौतूहल कुरुवंशके योग्य ही है। तुम्हारा वचन मेरे मनमें बड़ा भारी हर्ष उत्पन्न कर रहा है ॥ ४ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि शृण्वानस्य नराधिप ।
अभिषेकं कुमारस्य प्रभावं च महात्मनः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! तुम ध्यान देकर सुन रहे हो, इसलिये मैं तुमसे प्रसन्नतापूर्वक महात्मा कुमार कार्तिकेयके अभिषेक और प्रभावका वर्णन करता हूँ ॥ ५ ॥
तेजो माहेश्वरं स्कन्नमग्नौ प्रपतितं पुरा ।
तत् सर्वभक्षो भगवान् नाशकद् दग्धुमक्षयम् ॥ ६ ॥
पूर्वकालकी बात है, भगवान् शिवका तेजोमय वीर्य अग्निमें गिर पड़ा। भगवान् अग्नि सर्वभक्षी हैं तो भी उस अक्षय वीर्यको वे भस्म न कर सके ॥ ६ ॥
तेनासीदतितेजस्वी दीप्तिमान् हव्यवाहनः ।
न चैव धारयामास गर्भं तेजोमयं तदा ॥ ७ ॥
स गङ्गामभिसंगम्य नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभुः ।
गर्भमाहितवान् दिव्यं भास्करोपमतेजसम् ॥ ८ ॥
उस वीर्यके कारण अग्निदेव दीप्तिमान्, तेजस्वी तथा शक्तिसम्पन्न होकर भी कष्टका अनुभव करने लगे। वे उस समय उस तेजोमय गर्भको जब धारण न कर सके, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन भगवान् अग्निदेवने सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य गर्भको गंगाजीमें डाल दिया ॥
अथ गङ्गापि तं गर्भमसहन्ती विधारणे ।
उत्ससर्ज गिरौ रम्ये हिमवत्यमरार्चिते ॥ ९ ॥
तदनन्तर गंगाने भी उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे देवपूजित सुरम्य हिमालय पर्वतके शिखरपर सरकण्डोंमें छोड़ दिया ॥ ९ ॥
स तत्र ववृधे लोकानावृत्य ज्वलनात्मजः ।
ददृशुर्ज्वलनाकारं तं गर्भमथ कृत्तिकाः ॥ १० ॥
शरस्तम्बे महात्मानमनलात्मजमीश्वरम् ।
ममायमिति ताः सर्वाः पुत्रार्थिन्योऽभिचुक्रुशुः ॥ ११ ॥
अग्निका वह पुत्र अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके वहाँ बढ़ने लगा। सरकण्डोंके समूहमें अग्निके समान प्रकाशित होते हुए उस सर्वसमर्थ महात्मा अग्निपुत्रको, जो नवजात शिशुके रूपमें उपस्थित था, छहों कृत्तिकाओंने देखा। उसे देखते ही पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली वे सभी कृत्तिकाएँ पुकार-पुकारकर कहने लगीं 'यह मेरा पुत्र है' ॥
तासां विदित्वा भावं तं मातृणां भगवान् प्रभुः ।
प्रस्नुतानां पयः षड्भिर्वदनैरपिबत् तदा ॥ १२ ॥
उन माताओंके उस वात्सल्यभावको जानकर प्रभावशाली भगवान् स्कन्द छः मुख प्रकट करके उनके स्तनोंसे झरते हुए दूधको पीने लगे ॥ १२ ॥
तं प्रभावं समालक्ष्य तस्य बालस्य कृत्तिकाः ।
परं विस्मयमापन्ना देव्यो दिव्यवपुर्धराः ॥ १३ ॥
वे दिव्य रूपधारिणी छहों कृत्तिका देवियाँ उस बालकका वह प्रभाव देखकर अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठीं ॥ १३ ॥
यत्रोत्सृष्टः स भगवान् गङ्गया गिरिमूर्धनि ।
स शैलः काञ्चनः सर्वः सम्बभौ कुरुसत्तम ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! गंगाजीने पर्वतके जिस शिखरपर स्कन्दको छोड़ा था, वह सारा-का-सारा सुवर्णमय हो गया ॥ १४ ॥
वर्धता चैव गर्भेण पृथिवी तेन रञ्जिता ।
अतश्च सर्वे संवृत्ता गिरयः काञ्चनाकराः ॥ १५ ॥
उस बढ़ते हुए शिशुने वहाँकी भूमिको रंजित (प्रकाशित) कर दिया था। इसलिये वहाँके सभी पर्वत सोनेकी खान बन गये ॥ १५ ॥
कुमारः सुमहावीर्यः कार्तिकेय इति स्मृतः । गाङ्गेयः पूर्वमभवन्महायोगबलान्वितः ॥ १६ ॥ वह महान् शक्तिशाली कुमार कार्तिकेयके नामसे विख्यात हुआ। वह महान् योगबलसे सम्पन्न बालक पहले गंगाजीका पुत्र था ॥ १६ ॥
शमेन तपसा चैव वीर्येण च समन्वितः । ववृधेऽतीव राजेन्द्र चन्द्रवत् प्रियदर्शनः ॥ १७ ॥ राजेन्द्र! शम, तपस्या और पराक्रमसे युक्त वह कुमार अत्यन्त वेगसे बढ़ने लगा। वह देखनेमें चन्द्रमाके समान प्रिय लगता था ॥ १७ ॥
स तस्मिन् काञ्चने दिव्ये शरस्तम्बे श्रिया वृतः । स्तूयमानः सदा शेते गन्धर्वैर्मुनिभिस्तथा ॥ १८ ॥ उस दिव्य सुवर्णमय प्रदेशमें सरकण्डोंके समूहपर स्थित हुआ वह कान्तिमान् बालक निरन्तर गन्धर्वों एवं मुनियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ सो रहा था ॥ १८ ॥
तथैतमन्वनृत्यन्त देवकन्याः सहस्रशः । दिव्यवादित्रनृत्यज्ञाः स्तुवन्त्यश्चारुदर्शनाः ॥ १९ ॥ तदनन्तर दिव्य वाद्य और नृत्यकी कला जाननेवाली सहस्रों सुन्दरी देवकन्याएँ उस कुमारकी स्तुति करती हुई उसके समीप नृत्य करने लगीं ॥ १९ ॥
अन्वास्ते च नदी देवं गङ्गा वै सरितां वरा । दधार पृथिवी चैनं बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ २० ॥ सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा भी उस दिव्य बालकके पास आ बैठीं। पृथ्वीदेवीने उत्तम रूप धारण करके उसे अपने अंकमें धारण किया ॥ २० ॥
जातकर्मादिकास्तत्र क्रियाश्चक्रे बृहस्पतिः । वेदश्चैनं चतुर्मूर्तिरुपतस्थे कृताञ्जलिः ॥ २१ ॥ बृहस्पतिजीने वहाँ उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये और चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाला वेद हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २१ ॥
धनुर्वेदश्चतुष्पादः शस्त्रग्रामः ससंग्रहः । तत्रैनं समुपातिष्ठत् साक्षाद् वाणी च केवला ॥ २२ ॥ चारों चरणोंसे युक्त धनुर्वेद, संग्रहसहित शस्त्र-समूह तथा केवल साक्षात् वाणी—ये सभी कुमारकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ २२ ॥
स ददर्श महावीर्यं देवदेवमुमापतिम् । शैलपुत्र्या समासीनं भूतसंघशतैर्वृतम् ॥ २३ ॥
कुमारने देखा कि सैकड़ों भूतसंघोंसे घिरे हुए महापराक्रमी देवाधिदेव उमापति गिरिराजनन्दिनी उमाके साथ पास ही बैठे हुए हैं ॥ २३ ॥
निकाया भूतसंघानां परमाद्भुतदर्शनाः ।
विकृता विकृताकारा विकृताभरणध्वजाः ॥ २४ ॥
उनके साथ आये हुए भूतसंघोंके शरीर देखनेमें बड़े ही अद्भुत, विकृत और विकराल थे। उनके आभूषण और ध्वज भी बड़े विकट थे ॥ २४ ॥
व्याघ्रसिंहर्क्षवदना विडालमकराननाः ।
वृषदंशमुखाश्चान्ये गजोष्ट्रवदनास्तथा ॥ २५ ॥
उलूकवदनाः केचिद् गृध्रगोमायुदर्शनाः ।
क्रौञ्चपारावतनिभैर्वदनै राङ्कवैरपि ॥ २६ ॥
उनमेंसे किन्हींके मुँह बाघ और सिंहके समान थे तो किन्हींके रीछ, बिल्ली और मगरके समान। कितनोंके मुख वनबिलावोंके तुल्य थे। कितने ही हाथी, ऊँट और उल्लूके समान मुखवाले थे। बहुत-से गीधों और गीदड़ोंके समान दिखायी देते थे। किन्हीं-किन्हींके मुख क्रौंच पक्षी, कबूतर और रंकु मृगके समान थे ॥ २५-२६ ॥
श्वाविच्छल्यकगोधानामाजैडकगवां तथा ।
सदृशानि वपूंष्यन्ते तत्र तत्र व्यधारयन् ॥ २७ ॥
बहुतेरे भूत जहाँ-तहाँ हिंसक जन्तु, साही, गोह, बकरी, भेड़ और गायोंके समान शरीर धारण करते थे ॥
केचिच्छैलाम्बुदप्रख्याश्चक्रोद्यतगदायुधाः ।
केचिदञ्जनपुञ्जाभाः केचिच्छ्वेताचलप्रभाः ॥ २८ ॥
कितने ही मेघों और पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें चक्र और गदा आदि आयुध ले रखे थे। कोई अंजनपुंजके समान काले और कोई श्वेत गिरिके समान गौर कान्तिसे सुशोभित होते थे ॥
सप्त मातृगणाश्चैव समाजग्मुर्विशाम्पते ।
साध्या विश्वेऽथ मरुतो वसवः पितरस्तथा ॥ २९ ॥
रुद्रादित्यास्तथा सिद्धा भुजगा दानवाः खगाः ।
ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् सपुत्रः सह विष्णुना ॥ ३० ॥
शक्रस्तथाभ्ययाद् द्रष्टुं कुमारवरमच्युतम् ।
प्रजानाथ! वहाँ सात मातृकाएँ* आ गयी थीं। साध्य, विश्व, मरुद्गण, वसुगण, पितर, रुद्र, आदित्य, सिद्ध, भुजंग, दानव, पक्षी, पुत्रसहित स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा, श्रीविष्णु तथा इन्द्र अपने नियमोंसे च्युत न होनेवाले उस श्रेष्ठ कुमारको देखनेके लिये पधारे थे ॥ २९-३०
१/२ ॥
नारदप्रमुखाश्चापि देवगन्धर्वसत्तमाः ॥ ३१ ॥ देवर्षयश्च सिद्धाश्च बृहस्पतिपुरोगमाः । पितरो जगतः श्रेष्ठा देवानापि देवताः ॥ ३२ ॥ तेऽपि तत्र समाजग्मुर्यामा धामाश्च सर्वशः । देवताओं और गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ नारद आदि देवर्षि, बृहस्पति आदि सिद्ध, सम्पूर्ण जगत्से श्रेष्ठ तथा देवताओंके भी देवता पितृगण, सम्पूर्ण यामगण और धामगण भी वहाँ आये थे ॥ ३१-३२ १/२ ॥
स तु बालोऽपि बलवान् महायोगबलान्वितः ॥ ३३ ॥ अभ्याजगाम देवेशं शूलहस्तं पिनाकिनम् । बालक होनेपर भी बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न कुमार त्रिशूल और पिनाक धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् शिवकी ओर चले ॥ ३३ १/२ ॥
तमाव्रजन्तमालक्ष्य शिवस्यासीन्मनोगतम् ॥ ३४ ॥ युगपच्छैलपुत्र्याश्च गङ्गायाः पावकस्य च । कं नु पूर्वमयं बालो गौरवादभ्युपैष्यति ॥ ३५ ॥ अपि मामिति सर्वेषां तेषामासीन्मनोगतम् । उन्हें आते देख एक ही समय भगवान् शंकर, गिरिराजनन्दिनी उमा, गंगा और अग्निदेवके मनमें यह संकल्प उठा कि देखें यह बालक पिता-माताका गौरव प्रदान करनेके लिये पहले किसके पास जाता है? क्या यह मेरे पास आयेगा? यह प्रश्न उन सबके मनमें उठा ॥
तेषामेतमभिप्रायं चतुर्णामुपलक्ष्य सः ॥ ३६ ॥ युगपद् योगमास्थाय ससर्ज विविधास्तनूः । तब उन सबके अभिप्रायको लक्ष्य करके कुमारने एक ही साथ योगबलका आश्रय ले अपने अनेक शरीर बना लिये ॥ ३६ १/२ ॥
ततोऽभवच्चतुर्मूर्तिः क्षणेन भगवान् प्रभुः ॥ ३७ ॥ तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठतः । तदनन्तर प्रभावशाली भगवान् स्कन्द क्षणभरमें चार रूपोंमें प्रकट हो गये। पीछे जो उनकी मूर्तियाँ प्रकट हुईं, उनका नाम क्रमशः शाख, विशाख और नैगमेय हुआ ॥
एवं स कृत्वा ह्यात्मानं चतुर्धा भगवान् प्रभुः ॥ ३८ ॥ यतो रुद्रस्ततः स्कन्दो जगामाद्भुतदर्शनः । विशाखस्तु ययौ येन देवी गिरिवरात्मजा ॥ ३९ ॥ इस प्रकार अपने-आपको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके अद्भुत दिखायी देनेवाले प्रभावशाली भगवान् स्कन्द जहाँ रुद्र थे, उधर ही गये। विशाख उस ओर चल दिये, जिस ओर गिरिराजनन्दिनी उमा देवी बैठी थीं ॥
शाखो ययौ स भगवान् वायुमूर्तिर्विभावसुम् । नैगमेयोऽगमद् गङ्गां कुमारः पावकप्रभः ॥ ४० ॥ वायुमूर्ति भगवान् शाख अग्निके पास और अग्नितुल्य तेजस्वी नैगमेय गंगाजीके निकट गये ॥ ४० ॥
सर्वे भासुरदेहास्ते चत्वारः समरूपिणः । तान् समभ्ययुरव्यग्रास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४१ ॥ उन चारोंके रूप एक समान थे। उन सबके शरीर तेजसे उद्भासित हो रहे थे। वे चारों कुमार उन चारोंके पास एक साथ जा पहुँचे। वह एक अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ ४१ ॥
हाहाकारो महानासीद् देवदानवरक्षसाम् । तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यमद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४२ ॥ वह महान् आश्चर्यमय, अद्भुत तथा रोमांचकारी घटना देखकर देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ४२ ॥
ततो रुद्रश्च देवी च पावकश्च पितामहम् । गङ्गया सहिताः सर्वे प्रणिपेतूर्जगत्पतिम् ॥ ४३ ॥ तदनन्तर भगवान् रुद्र, देवी पार्वती, अग्निदेव तथा गंगाजी—इन सबने एक साथ लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम किया ॥ ४३ ॥
प्रणिपत्य ततस्ते तु विधिवद् राजपुङ्गव । इदमूचुर्वचो राजन् कार्तिकेयप्रियेप्सया ॥ ४४ ॥ राजन्! नृपश्रेष्ठ! विधिपूर्वक प्रणाम करके वे सब कार्तिकेयका प्रिय करनेकी इच्छासे यह वचन बोले— ॥
अस्य बालस्य भगवन्नाधिपत्यं यथेप्सितम् । अस्मत्प्रियार्थं देवेश सदृशं दातुमर्हसि ॥ ४५ ॥ ‘देवेश्वर! भगवन्! आप हमलोगोंका प्रिय करनेके लिये इस बालकको यथायोग्य मनकी इच्छाके अनुरूप कोई आधिपत्य प्रदान कीजिये’ ॥ ४५ ॥
ततः स भगवान् धीमान् सर्वलोकपितामहः । मनसा चिन्तयामास किमयं लभतामिति ॥ ४६ ॥ तदनन्तर सर्वलोकपितामह बुद्धिमान् भगवान् ब्रह्माने मन-ही-मन चिन्तन किया कि ‘यह बालक कौन-सा आधिपत्य ग्रहण करे’ ॥ ४६ ॥
ऐश्वर्याणि च सर्वाणि देवगन्धर्वरक्षसाम् । भूतयक्षविहङ्गानां पन्नगानां च सर्वशः ॥ ४७ ॥ पूर्वमेवादिदेशासौ निकायेषु महात्मनाम् । समर्थं च तमैश्वर्ये महामतिरमन्यत ॥ ४८ ॥
महामति ब्रह्माने जगत्के भिन्न-भिन्न पदार्थोंके ऊपर देवता, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, भूत, नाग और पक्षियोंका आधिपत्य पहलेसे ही निर्धारित कर रखा था। साथ ही वे कुमारको भी आधिपत्य करनेमें समर्थ मानते थे॥ ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा देवानां श्रेयसि स्थितः। सैनापत्यं ददौ तस्मै सर्वभूतेषु भारत ॥ ४९ ॥ भरतनन्दन! तदनन्तर देवगणोंके मंगल-सम्पादनमें तत्पर हुए ब्रह्माने दो घड़ीतक चिन्तन करनेके पश्चात् सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ कार्तिकेयको सम्पूर्ण देवताओंका सेनापति पद प्रदान किया ॥ ४९ ॥ सर्वदेवनिकायानां ये राजानः परिश्रुताः। तान् सर्वान् व्यादिदेशास्मै सर्वभूतपितामहः ॥ ५० ॥ जो सम्पूर्ण देवसमूहोंके राजारूपमें विख्यात थे, उन सबको सर्वभूतपितामह ब्रह्माने कुमारके अधीन रहनेका आदेश दिया ॥ ५० ॥ ततः कुमारमादाय देवा ब्रह्मपुरोगमाः। अभिषेकार्थमाजग्मुः शैलेन्द्रं सहितास्ततः ॥ ५१ ॥ पुण्यां हैमवतीं देवीं सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम्। समन्तपञ्चके या वै त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ५२ ॥ तब ब्रह्मा आदि देवता अभिषेकके लिये कुमारको लेकर एक साथ गिरिराज हिमालयपर वहाँसे निकली हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला सरस्वती देवीके तटपर गये, जो समन्त-पंचकतीर्थमें प्रवाहित होकर तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ तत्र तीरे सरस्वत्याः पुण्ये सर्वगुणान्विते। निषेदुर्देवगन्धर्वाः सर्वे सम्पूर्णमानसाः ॥ ५३ ॥ वहाँ वे सभी देवता और गन्धर्व पूर्ण मनोरथ हो सरस्वतीके सर्वगुणसम्पन्न पावन तटपर विराजमान हुए ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुमाराभिषेकोपक्रमे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारके अभिषेककी तैयारीविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
* ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, इन्द्राणी, वाराही तथा चामुण्डा—ये सात मातृकाएँ हैं।
स्कन्दका अभिषेक और उनके महापार्षदोंके नाम, रूप आदिका वर्णन
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
स्कन्दका अभिषेक और उनके महापार्षदोंके नाम, रूप आदिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततोऽभिषेकसम्भारान् सर्वान् सम्भृत्य शास्त्रतः ।
बृहस्पतिः समिद्धेऽग्नौ जुहावाग्निं यथाविधि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर बृहस्पतिजीने सम्पूर्ण अभिषेकसामग्रीका संग्रह करके शास्त्रीय पद्धतिसे प्रज्वलित की हुई अग्निमें विधिपूर्वक होम किया ॥ १ ॥
ततो हिमवता दत्ते मणिप्रवरशोभिते ।
दिव्यरत्नाचिते पुण्ये निषण्णं परमासने ॥ २ ॥
सर्वमङ्गलसम्भारैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ।
आभिषेचनिकं द्रव्यं गृहीत्वा देवतागणाः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् हिमवान्के दिये हुए उत्तम मणियोंसे सुशोभित तथा दिव्य रत्नोंसे जटिल पवित्र सिंहासनपर कुमार कार्तिकेय विराजमान हुए। उस समय उनके पास सम्पूर्ण मांगलिक उपकरणोंके साथ विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिषेकद्रव्य लेकर समस्त देवता वहाँ पधारे ॥
इन्द्राविष्णू महावीर्यौ सूर्याचन्द्रमसौ तथा ।
धाता चैव विधाता च तथा चैवानिलानलौ ॥ ४ ॥
पूष्णा भगेनार्यम्णा च अंशेन च विवस्वता ।
रुद्रश्च सहितो धीमान् मित्रेण वरुणेन च ॥ ५ ॥
रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभुः ।
महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता, वायु और अग्नि, पूषा, भग, अर्यमा, अंश, विवस्वान्, मित्र और वरुणके साथ बुद्धिमान् रुद्रदेव, एकादश रुद्रगण, आठ वसु, बारह आदित्य और दोनों अश्विनीकुमार—ये सब-के-सब प्रभावशाली कुमार कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए ॥ ४-५½ ॥
विश्वेदेवैर्मरुद्भिश्च साध्यैश्च पितृभिः सह ॥ ६ ॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च यक्षराक्षसपन्नगैः ।
देवर्षिभिरसंख्यातैस्तथा ब्रह्मर्षिभिस्तथा ॥ ७ ॥
वैखानसैर्वालखिल्यैर्वाव्याहारैर्मरीचिपैः ।
भृगुभिश्चाङ्गिरोभिश्च यतिभिश्च महात्मभिः ॥ ८ ॥
सर्पैर्विद्याधरैः पुण्यैर्योगसिद्धैस्तथा वृतः ।
विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्यगण, पितृगण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, नाग, असंख्य देवर्षि, ब्रह्मर्षि, वनवासी मुनि, वालखिल्य, वायु पीकर रहनेवाले ऋषि, सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले मुनि, भृगु और अंगिराके वंशमें उत्पन्न महर्षि, महात्मा यतिगण, सर्प, विद्याधर तथा पुण्यात्मा योगसिद्ध मुनि भी कार्तिकेयको घेरकर खड़े हुए ।। ६—८½ ।।
पितामहः पुलस्त्यश्च पुलहश्च महातपाः ।। ९ ।।
अङ्गिराः कश्यपोऽत्रिश्च मरीचिर्भृगुरेव च ।
क्रतुर्हरः प्रचेताश्च मनुर्दक्षस्तथैव च ।। १० ।।
ऋतवश्च ग्रहाश्चैव ज्योतींषि च विशाम्पते ।
मूर्तिमत्यश्च सरितो वेदाश्चैव सनातनाः ।। ११ ।।
समुद्राश्च हृदाश्चैव तीर्थानि विविधानि च ।
पृथिवी द्यौर्दिशश्चैव पादपाश्च जनाधिप ।। १२ ।।
अदितिर्देवमाता च ह्रीः श्रीः स्वाहा सरस्वती ।
उमा शची सिनीवाली तथा चानुमतिः कुहूः ।। १३ ।।
राका च धिषणा चैव पत्न्यश्चान्या दिवौकसाम् ।
हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्चानेकशृङ्गवान् ।। १४ ।।
ऐरावतः सानुचरः कलाः काष्ठास्तथैव च ।
मासार्धमासा ऋतवस्तथा रात्र्यहनी नृप ।। १५ ।।
उच्चैःश्रवा हयश्रेष्ठो नागराजश्च वासुकिः ।
अरुणो गरुडश्चैव वृक्षाश्चौषधिभिः सह ।। १६ ।।
धर्मश्च भगवान् देवः समाजग्मुर्हि सङ्गताः ।
कालो यमश्च मृत्युश्च यमस्यानुचराश्च ये ।। १७ ।।
प्रजानाथ! ब्रह्माजी, पुलस्त्य, महातपस्वी पुलह, अंगिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि, भृगु, क्रतु, हर, वरुण, मनु, दक्ष, ऋतु, ग्रह, नक्षत्र, मूर्तिमती सरिताएँ, मूर्तिमान् सनातन वेद, समुद्र, सरोवर, नाना प्रकारके तीर्थ, पृथिवी, द्युलोक, दिशा, वृक्ष, देवमाता अदिति, ह्री, श्री, स्वाहा, सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति, कुहू, राका, धिषणा, देवताओंकी अन्यान्य पत्नियाँ, हिमवान्, विन्ध्य, अनेक शिखरोंसे सुशोभित मेरुगिरि, अनुचरोंसहित ऐरावत, कला, काष्ठा, मास, पक्ष, ऋतु, रात्रि, दिन, अश्वोंमें श्रेष्ठ उच्चैःश्रवा, नागराज वासुकि, अरुण, गरुड़, ओषधियोंसहित वृक्ष, भगवान् धर्मदेव, काल, यम, मृत्यु तथा यमके अनुचर—ये सब-के-सब वहाँ एक साथ पधारे थे ।। ९—१७ ।।
बहुलत्वाच्च नोक्ता ये विविधा देवतागणाः ।
ते कुमाराभिषेकार्थं समाजग्मुस्ततस्ततः ।। १८ ।।
संख्यामें अधिक होनेके कारण जिनके नाम यहाँ नहीं बताये गये हैं, वे सभी नाना प्रकारके देवता कुमार कार्तिकेयका अभिषेक करनेके लिये इधर-उधरसे वहाँ आ पहुँचे थे॥ १८॥
जगृहुस्ते तदा राजन् सर्व एव दिवौकसः।
आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः॥ १९॥
राजन्! उस समय उन सभी देवताओंने अभिषेकके पात्र और सब प्रकारके मांगलिक द्रव्य हाथोंमें ले रखे थे॥ १९॥
दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप।
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोयाभिरेव तु॥ २०॥
अभ्यषिञ्चन् कुमारं वै सम्प्रहृष्टा दिवौकसः।
सेनापतिं महात्मानमसुराणां भयंकरम्॥ २१॥
नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर-भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे॥ २०-२१॥
पुरा यथा महाराज वरुणं वै जलेश्वरम्।
तथाभ्यषिञ्चद् भगवान् सर्वलोकपितामहः॥ २२॥
कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये लोककीर्तिताः।
महाराज! जैसे पूर्वकालमें जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किया गया था, उसी प्रकार सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा, महातेजस्वी कश्यप तथा दूसरे विश्वविख्यात महर्षियोंने कार्तिकेयका अभिषेक किया॥ २२ १/२॥
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो बलिनो वातरंहसः॥ २३॥
कामवीर्यधरान् सिद्धान् महापार्षदान् प्रभुः।
नन्दिसेनं लोहिताक्षं घण्टाकर्णं च सम्मतम्॥ २४॥
चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम्।
उस समय भगवान् ब्रह्माने संतुष्ट होकर कार्तिकेयको वायुके समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान् और सिद्ध चार महान् अनुचर प्रदान किये, जिनमें पहला नन्दिसेन, दूसरा लोहिताक्ष, तीसरा परम प्रिय घण्टाकर्ण और उनका चौथा अनुचर कुमुदमालीके नामसे विख्यात था॥
तत्र स्थाणुर्महातेजा महापार्षदं प्रभुः॥ २५॥
मायाशतधरं कामं कामवीर्यं बलान्वितम्।
ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम्॥ २६॥
राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान् शंकरने स्कन्दको एक महान् असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा
दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था ।। २५-२६ ।।
स हि देवासुरे युद्धे दैत्यानां भीमकर्मणाम् ।
जघान दोर्भ्यां संक्रुद्धः प्रयुतानि चतुर्दश ।। २७ ।।
उसने देवासुरसंग्राममें अत्यन्त कुपित होकर भयानक कर्म करनेवाले चौदह प्रयुत* दैत्योंका केवल अपनी दोनों भुजाओंसे वध कर डाला था ।। २७ ।।
तथा देवा ददुस्तस्मै सेनां नैर्ऋतसंकुलाम् ।
देवशत्रुक्षयकरीमजय्यां विष्णुरूपिणीम् ।। २८ ।।
इसी प्रकार देवताओंने उन्हें देव-शत्रुओंका विनाश करनेवाली, अजेय एवं विष्णुरूपिणी सेना प्रदान की, जो नैर्ऋतोंसे भरी हुई थी ।। २८ ।।
जयशब्दं तथा चक्रुर्देवाः सर्वे सवासवाः ।
गन्धर्वा यक्षरक्षांसि मुनयः पितरस्तथा ।। २९ ।।
उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, मुनियों तथा पितरोंने जय-जयकार किया ।।
ततः प्रादादनुचरौ यमः कालोपमावुभौ ।
उन्मथश्च प्रमाथश्च महावीर्यौ महाद्युती ।। ३० ।।
तत्पश्चात् यमराजने उन्हें दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे उन्मथ और प्रमाथ। वे दोनों कालके समान महापराक्रमी और महातेजस्वी थे ।। ३० ।।
सुभ्राजो भास्वरश्चैव यौ तौ सूर्यानुक्यायिनौ ।
तौ सूर्यः कार्तिकेयाय ददौ प्रीतः प्रतापवान् ।। ३१ ।।
सुभ्राज और भास्वर—जो सूर्यके अनुचर थे, उन्हें प्रतापी सूर्यने प्रसन्न होकर कार्तिकेयकी सेवामें दे दिया ।। ३१ ।।
कैलासशृङ्गसंकाशौ श्वेतमाल्यानुलेपनौ ।
सोमोऽप्यनुचरौ प्रादान्मणिं सुमणिमेव च ।। ३२ ।।
चन्द्रमाने भी कैलास-शिखरके समान श्वेतवर्णवाले तथा श्वेत माला और श्वेत चन्दन धारण करनेवाले दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे मणि और सुमणि ।।
ज्वालाजिह्वं तथा ज्योतिरात्मजाय हुताशनः ।
ददावनुचरौ शूरौ परसैन्यप्रमाथिनौ ।। ३३ ।।
अग्निदेवने भी अपने पुत्र स्कन्दको ज्वालाजिह्व तथा ज्योति नामक दो शूर सेवक प्रदान किये, जो शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले थे ।। ३३ ।।
परिघं च वटं चैव भीमं च सुमहाबलम् ।
दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसम्मतौ ।। ३४ ।।
अंशोऽप्यनुचरान् पञ्च ददौ स्कन्दाय धीमते ।
अंशने भी बुद्धिमान् स्कन्दको पाँच अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम इस प्रकार हैं—परिघ, वट, महाबली भीम तथा दहति और दहन। इनमेंसे दहति और दहन बड़े प्रचण्ड तथा बल-पराक्रमकी दृष्टिसे सम्मानित थे।।
उत्क्रोशं पञ्चकं चैव वज्रदण्डधरावुभौ ।। ३५ ।।
ददावनलपुत्राय वासवः परवीरहा ।
तौ हि शत्रून् महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे बहून् ।। ३६ ।।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रने अग्निकुमार स्कन्दको उत्क्रोश और पंचक नामक दो अनुचर प्रदान किये। वे दोनों क्रमशः वज्र और दण्ड धारण करनेवाले थे। उन दोनोंने समरांगणमें इन्द्रके बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला था ।। ३५-३६ ।।
चक्रं विक्रमकं चैव संक्रमं च महाबलम् ।
स्कन्दाय त्रीननुचरान् ददौ विष्णुर्महायशाः ।। ३७ ।।
महायशस्वी भगवान् विष्णुने स्कन्दको चक्र, विक्रम और महाबली संक्रम—ये तीन अनुचर दिये ।। ३७ ।।
वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ ।
स्कन्दाय ददतुः प्रीतावश्विनौ भिषजां वरौ ।। ३८ ।।
सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण चिकित्सकचूड़ामणि अश्विनीकुमारोंने प्रसन्न होकर स्कन्दको वर्धन और नन्दन नामक दो सेवक दिये ।। ३८ ।।
कुन्दं च कुसुमं चैव कुमुदं च महायशाः ।
डम्बराडम्बरौ चैव ददौ धाता महात्मने ।। ३९ ।।
महायशस्वी धाताने महात्मा स्कन्दको कुन्द, कुसुम, कुमुद, डम्बर और आडम्बर—ये पाँच सेवक प्रदान किये ।। ३९ ।।
चक्रानुचक्रौ बलिनौ मेघचक्रौ बलोत्कटौ ।
ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ ।। ४० ।।
प्रजापति त्वष्टाने बलवान्, बलोन्मत्त, महामायावी और मेघचक्रधारी चक्र और अनुचक्र नामक दो अनुचर स्कन्दकी सेवामें उपस्थित किये ।। ४० ।।
सुव्रतं सत्यसंधं च ददौ मित्रो महात्मने ।
कुमाराय महात्मानौ तपोविद्याधरौ प्रभुः ।। ४१ ।।
सुदर्शनीयौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ।
भगवान् मित्रने महात्मा कुमारको सुव्रत और सत्यसंध नामक दो सेवक प्रदान किये। वे दोनों ही तप और विद्या धारण करनेवाले तथा महामनस्वी थे। इतना ही नहीं, वे देखनेमें बड़े ही सुन्दर, वर देनेमें समर्थ तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे ।। ४१ ½ ।।
सुव्रतं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च ।। ४२ ।।
कार्तिकेयाय सम्प्रादाद् विधाता लोकविश्रुतौ ।
विधाताने कार्तिकेयको महामना सुव्रत और सुकर्मा—ये दो लोकविख्यात सेवक प्रदान किये ।। ४२ १/२ ।।
पाणीतकं कालिकं च महामायाविनावुभौ ।। ४३ ।।
पूषा च पार्षदौ प्रादात् कार्तिकेयाय भारत ।
भरतनन्दन! पूषाने कार्तिकेयको पाणीतक और कालिक नामक दो पार्षद प्रदान किये। वे दोनों ही बड़े भारी मायावी थे ।। ४३ १/२ ।।
बलं चातिबलं चैव महावक्त्रौ महाबलौ ।। ४४ ।।
प्रददौ कार्तिकेयाय वायुर्भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ! वायु देवताने कृत्तिकाकुमारको महान् बलशाली एवं विशाल मुखवाले बल और अतिबल नामक दो सेवक प्रदान किये ।। ४४ १/२ ।।
यमं चातियमं चैव तिमिवक्त्रौ महाबलौ ।। ४५ ।।
प्रददौ कार्तिकेयाय वरुणः सत्यसङ्गरः ।
सत्यप्रतिज्ञ वरुणने कृत्तिकानन्दन स्कन्दको यम और अतियम नामक दो महाबली पार्षद दिये, जिनके मुख तिमि नामक महामत्स्यके समान थे ।। ४५ १/२ ।।
सुवर्चसं महात्मानं तथैवाप्यतिवर्चसम् ।। ४६ ।।
हिमवान् प्रददौ राजन् हुताशनसुताय वै ।
राजन्! हिमवान्ने अग्निकुमारको महामना सुवर्चा और अतिवर्चा नामक दो पार्षद प्रदान किये ।। ४६ १/२ ।।
काञ्चनं च महात्मानं मेघमालिनमेव च ।। ४७ ।।
ददावनुचरो मेरुरग्निपुत्राय भारत ।
भारत! मेरुने अग्निपुत्र स्कन्दको महामना कांचन और मेघमाली नामक दो अनुचर अर्पित किये ।। ४७ १/२ ।।
स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ ।। ४८ ।।
महात्मा त्वग्निपुत्राय महाबलपराक्रमौ ।
महामना मेरुने ही अग्निपुत्र कार्तिकेयको स्थिर और अतिस्थिर नामक दो पार्षद और दिये। वे दोनों महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे ।। ४८ १/२ ।।
उच्छृङ्गं चातिशृङ्गं च महापाषाणयोधिनौ ।। ४९ ।।
प्रददावग्निपुत्राय विन्ध्यः पारिषदावुभौ ।
विन्ध्य पर्वतने भी अग्निकुमारको दो पार्षद प्रदान किये, जिनके नाम थे उच्छृंग और अतिशृंग। वे दोनों ही बड़े-बड़े पत्थरोंकी चट्टानोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल थे ।।
संग्रहं विग्रहं चैव समुद्रोऽपि गदाधरौ ।। ५० ।।
प्रददावग्निपुत्राय महापारिषदावुभौ ।
समुद्रने भी अग्निपुत्रको दो गदाधारी महापार्षद दिये, जिनके नाम थे—संग्रह और विग्रह॥ ५०१/२॥ उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथैव च ॥ ५१ ॥ प्रददावग्निपुत्राय पार्वती शुभदर्शना । शुभदर्शना पार्वती देवीने अग्निपुत्रको तीन पार्षद दिये—उन्माद, शंकुकर्ण तथा पुष्पदन्त ॥ ५११/२॥ जयं महाजयं चैव नागौ ज्वलनसूनवे ॥ ५२ ॥ प्रददौ पुरुषव्याघ्र वासुकिः पन्नगेश्वरः । पुरुषसिंह! नागराज वासुकिने अग्निकुमारको पार्षदरूपसे जय और महाजय नामक दो नाग भेंट किये॥ एवं साध्याश्च रुद्राश्च वसवः पितरस्तथा ॥ ५३ ॥ सागराः सरितश्चैव गिरयश्च महाबलाः । ददुः सेनागणाध्यक्षान् शूलपट्टिशधारिणः ॥ ५४ ॥ दिव्यप्रहरणोपेतान् नानावेषविभूषितान् । इस प्रकार साध्य, रुद्र, वसु, पितृगण, समुद्र, सरिताओं और महाबली पर्वतोंने उन्हें विभिन्न सेनापति अर्पित किये, जो शूल, पट्टिश और नाना प्रकारके दिव्य आयुध धारण किये हुए थे। वे सब-के-सब भाँति-भाँतिकी वेश-भूषासे विभूषित थे॥ ५३-५४१/२॥ शृणु नामानि चाप्येषां येऽन्ये स्कन्दस्य सैनिकाः ॥ ५५ ॥ विविधायुधसम्पन्नाश्चित्राभरणभूषिताः । स्कन्दके जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न और विचित्र आभूषणोंसे विभूषित अन्य सैनिक थे, उनके नाम सुनो ॥ ५५१/२॥ शङ्कुकर्णो निकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥ ५६ ॥ अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ । घ्राणश्रवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षो जलन्धमः ॥ ५७ ॥ अक्षः संतर्जनो राजन् कुन्दीकस्तमोऽन्तकृत् । एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजटः प्रभुः ॥ ५८ ॥ सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः । पुण्यनामा सुनामा च सुचक्रः प्रियदर्शनः ॥ ५९ ॥ परिश्रुतः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः । अजोदरो गजशिराः स्कन्धाक्षः शतलोचनः ॥ ६० ॥ ज्वालाजिह्वः करालाक्षः शितिकेशो जटी हरिः । परिश्रुतः कोकनदः कृष्णकेशो जटाधरः ॥ ६१ ॥ चतुर्दंष्ट्रोऽष्टजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः ।
विद्युताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ॥ ६२ ॥
उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः ।
समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च ॥ ६३ ॥
वृषो मेषः प्रवाहश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ।
धूम्रः श्वेतः कलिङ्गश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ॥ ६४ ॥
प्रियकश्चैव नन्दश्च गोनन्दश्च प्रतापवान् ।
आनन्दश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ॥ ६५ ॥
क्षेमवाहः सुवाहश्च सिद्धपात्रश्च भारत ।
गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ॥ ६६ ॥
गायनो हसनश्चैव बाणः खड्गश्च वीर्यवान् ।
वैताली गलिताली च तथा कथकवातिकौ ॥ ६७ ॥
हंसजः पङ्कदिग्धाङ्गः समुद्रोन्मादनश्च ह ।
रणोत्कटः प्रहासश्च श्वेतसिद्धश्च नन्दनः ॥ ६८ ॥
कालकण्ठः प्रभासश्च तथा कुम्भाण्डकोदरः ।
कालकक्षः सितश्चैव भूतानां मथनस्तथा ॥ ६९ ॥
यज्ञवाहः सुवाहश्च देवयाजी च सोमपः ।
मज्जानश्च महातेजाः क्रथक्राथौ च भारत ॥ ७० ॥
तुहरश्च तुहारश्च चित्रदेवश्च वीर्यवान् ।
मधुरः सुप्रसादश्च किरीटी च महाबलः ॥ ७१ ॥
वत्सलो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च ।
धर्मदो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ७२ ॥
श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः ।
दण्डबाहुः सुबाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ॥ ७३ ॥
अचलः कनकाक्षश्च बालानामपि यः प्रभुः ।
संचारकः कोकनदो गृध्रपत्रश्च जम्बुकः ॥ ७४ ॥
लोहाजवक्त्रो जवनः कुम्भवक्त्रश्च कुम्भकः ।
स्वर्णग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च चन्द्रभः ॥ ७५ ॥
पाणिकूर्चश्च शम्बूकः पञ्चवक्त्रश्च शिक्षकः ।
चाषवक्त्रश्च जम्बूकः शाकवक्त्रश्च कुज्जलः ॥ ७६ ॥
शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, कुमुद, अनन्त, द्वादशभुज, कृष्ण, उपकृष्ण, घ्राणश्रवा, कपिस्कन्ध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्ष, संतर्जन, कुनदीक, तमोऽन्तकृत्, एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजट, प्रभु, सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, क्षतिकम्पन, पुण्यनामा, सुनामा, सुचक्र, प्रियदर्शन, परिश्रुत, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन, अजोदर, गजशिरा, स्कन्धाक्ष, शतलोचन,
ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च द्वीपिर्सिंहानानास्तथा ।। ८२ ।।
किन्हीं-किन्हींके मुख मछली, मेढे, बकरी, भेड़, भैंसे, रीछ, व्याघ्र, भेड़िये तथा सिंहोंके समान थे ।। ८२ ।।
भीमा गजाननाश्चैव तथा नक्रमुखाश्च ये ।
गरुडाननाः कङ्कमुखा वृककाकमुखास्तथा ।। ८३ ।।
किन्हींके मुख हाथीके समान थे, इसलिये वे बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ पार्षदोंके मुख मगर, गरुड़, कंक भेड़ियों और कौओंके समान जान पड़ते थे ।।
गोखरोष्ट्रमुखाश्चान्ये वृषदंशमुखास्तथा ।
महाजठरपादाङ्गास्तारकाक्षाश्च भारत ।। ८४ ।।
भारत! कुछ पार्षद गाय, गदहा, ऊँट और वनबिलावके समान मुख धारण करते थे। किन्हींके पेट, पैर और दूसरे-दूसरे अंग भी विशाल थे। उनकी आँखें तारोंके समान चमकती थीं ।। ८४ ।।
पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे ।
कोकिलाभानानश्चान्ये श्येनतित्तिरिकाननाः ।। ८५ ।।
कुछ पार्षदोंके मुख कबूतर, बैल, कोयल, बाज और तीतरोंके समान थे ।। ८५ ।।
कृकलासमुखाश्चैव विरजोऽम्बरधारिणः ।
व्यालवक्त्राः शूलमुखाश्चण्डवक्त्राः शुभाननाः ।। ८६ ।।
किन्हीं-किन्हींके मुख गिरगिटके समान जान पड़ते थे। कुछ बहुत ही श्वेत वस्त्र धारण करते थे। किन्हींके मुख सर्पोंके समान थे तो किन्हींके शूलके समान। किन्हींके मुखसे अत्यन्त क्रोध टपकता था और किन्हींके मुखपर सौम्यभाव छा रहा था ।। ८६ ।।
आशीविषाश्चीरधरा गोनासावदनास्तथा ।
स्थूलोदराः कृशाङ्गाश्च स्थूलाङ्गाश्च कृशोदराः ।। ८७ ।।
कुछ विषधर सर्पोंके समान जान पड़ते थे। कोई चीर धारण करते थे और किन्हीं-किन्हींके मुख गायके नथुनोंके समान प्रतीत होते थे। किन्हींके पेट बहुत मोटे थे और किन्हींके अत्यन्त कृश। कोई शरीरसे बहुत दुबले-पतले थे तो कोई महास्थूलकाय दिखायी देते थे ।।
ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणाः ।
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।। ८८ ।।
किन्हींकी गर्दन छोटी और कान बड़े-बड़े थे। नाना प्रकारके सर्पोंको उन्होंने आभूषणके रूपमें धारण कर रखा था। कोई अपने शरीरमें हाथीकी खाल लपेटे हुए थे तो कोई काला मृगछाला धारण करते थे ।। ८८ ।।
स्कन्धेमुखा महाराज तथाप्युदरतोमुखाः ।
पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जङ्घामुखा अपि ।। ८९ ।।