महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2802, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंख्यामें अधिक होनेके कारण जिनके नाम यहाँ नहीं बताये गये हैं, वे सभी नाना प्रकारके देवता कुमार कार्तिकेयका अभिषेक करनेके लिये इधर-उधरसे वहाँ आ पहुँचे थे॥ १८॥
जगृहुस्ते तदा राजन् सर्व एव दिवौकसः।
आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः॥ १९॥
राजन्! उस समय उन सभी देवताओंने अभिषेकके पात्र और सब प्रकारके मांगलिक द्रव्य हाथोंमें ले रखे थे॥ १९॥
दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप।
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोयाभिरेव तु॥ २०॥
अभ्यषिञ्चन् कुमारं वै सम्प्रहृष्टा दिवौकसः।
सेनापतिं महात्मानमसुराणां भयंकरम्॥ २१॥
नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर-भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे॥ २०-२१॥
पुरा यथा महाराज वरुणं वै जलेश्वरम्।
तथाभ्यषिञ्चद् भगवान् सर्वलोकपितामहः॥ २२॥
कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये लोककीर्तिताः।
महाराज! जैसे पूर्वकालमें जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किया गया था, उसी प्रकार सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा, महातेजस्वी कश्यप तथा दूसरे विश्वविख्यात महर्षियोंने कार्तिकेयका अभिषेक किया॥ २२ १/२॥
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो बलिनो वातरंहसः॥ २३॥
कामवीर्यधरान् सिद्धान् महापार्षदान् प्रभुः।
नन्दिसेनं लोहिताक्षं घण्टाकर्णं च सम्मतम्॥ २४॥
चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम्।
उस समय भगवान् ब्रह्माने संतुष्ट होकर कार्तिकेयको वायुके समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान् और सिद्ध चार महान् अनुचर प्रदान किये, जिनमें पहला नन्दिसेन, दूसरा लोहिताक्ष, तीसरा परम प्रिय घण्टाकर्ण और उनका चौथा अनुचर कुमुदमालीके नामसे विख्यात था॥
तत्र स्थाणुर्महातेजा महापार्षदं प्रभुः॥ २५॥
मायाशतधरं कामं कामवीर्यं बलान्वितम्।
ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम्॥ २६॥
राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान् शंकरने स्कन्दको एक महान् असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा