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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

संख्यामें अधिक होनेके कारण जिनके नाम यहाँ नहीं बताये गये हैं, वे सभी नाना प्रकारके देवता कुमार कार्तिकेयका अभिषेक करनेके लिये इधर-उधरसे वहाँ आ पहुँचे थे॥ १८॥
जगृहुस्ते तदा राजन् सर्व एव दिवौकसः।
आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः॥ १९॥
राजन्! उस समय उन सभी देवताओंने अभिषेकके पात्र और सब प्रकारके मांगलिक द्रव्य हाथोंमें ले रखे थे॥ १९॥
दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप।
सरस्वतीभिः पुण्याभिर्दिव्यतोयाभिरेव तु॥ २०॥
अभ्यषिञ्चन् कुमारं वै सम्प्रहृष्टा दिवौकसः।
सेनापतिं महात्मानमसुराणां भयंकरम्॥ २१॥
नरेश्वर! हर्षसे उत्फुल्ल देवता पवित्र एवं दिव्य जलवाली सातों सरस्वती नदियोंके जलसे भरे हुए, दिव्य सामग्रियोंसे सम्पन्न, सुवर्णमय कलशोंद्वारा असुर-भयंकर महामनस्वीकुमार कार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक करने लगे॥ २०-२१॥
पुरा यथा महाराज वरुणं वै जलेश्वरम्।
तथाभ्यषिञ्चद् भगवान् सर्वलोकपितामहः॥ २२॥
कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये लोककीर्तिताः।
महाराज! जैसे पूर्वकालमें जलके स्वामी वरुणका अभिषेक किया गया था, उसी प्रकार सर्वलोकपितामह भगवान् ब्रह्मा, महातेजस्वी कश्यप तथा दूसरे विश्वविख्यात महर्षियोंने कार्तिकेयका अभिषेक किया॥ २२ १/२॥
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो बलिनो वातरंहसः॥ २३॥
कामवीर्यधरान् सिद्धान् महापार्षदान् प्रभुः।
नन्दिसेनं लोहिताक्षं घण्टाकर्णं च सम्मतम्॥ २४॥
चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम्।
उस समय भगवान् ब्रह्माने संतुष्ट होकर कार्तिकेयको वायुके समान वेगशाली, इच्छानुसार शक्तिधारी, बलवान् और सिद्ध चार महान् अनुचर प्रदान किये, जिनमें पहला नन्दिसेन, दूसरा लोहिताक्ष, तीसरा परम प्रिय घण्टाकर्ण और उनका चौथा अनुचर कुमुदमालीके नामसे विख्यात था॥
तत्र स्थाणुर्महातेजा महापार्षदं प्रभुः॥ २५॥
मायाशतधरं कामं कामवीर्यं बलान्वितम्।
ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम्॥ २६॥
राजेन्द्र! फिर वहाँ महातेजस्वी भगवान् शंकरने स्कन्दको एक महान् असुर समर्पित किया, जो सैकड़ों मायाओंको धारण करनेवाला, इच्छानुसार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा

दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ था ।। २५-२६ ।।
स हि देवासुरे युद्धे दैत्यानां भीमकर्मणाम् ।
जघान दोर्भ्यां संक्रुद्धः प्रयुतानि चतुर्दश ।। २७ ।।
उसने देवासुरसंग्राममें अत्यन्त कुपित होकर भयानक कर्म करनेवाले चौदह प्रयुत* दैत्योंका केवल अपनी दोनों भुजाओंसे वध कर डाला था ।। २७ ।।
तथा देवा ददुस्तस्मै सेनां नैर्ऋतसंकुलाम् ।
देवशत्रुक्षयकरीमजय्यां विष्णुरूपिणीम् ।। २८ ।।
इसी प्रकार देवताओंने उन्हें देव-शत्रुओंका विनाश करनेवाली, अजेय एवं विष्णुरूपिणी सेना प्रदान की, जो नैर्ऋतोंसे भरी हुई थी ।। २८ ।।
जयशब्दं तथा चक्रुर्देवाः सर्वे सवासवाः ।
गन्धर्वा यक्षरक्षांसि मुनयः पितरस्तथा ।। २९ ।।
उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, मुनियों तथा पितरोंने जय-जयकार किया ।।
ततः प्रादादनुचरौ यमः कालोपमावुभौ ।
उन्मथश्च प्रमाथश्च महावीर्यौ महाद्युती ।। ३० ।।
तत्पश्चात् यमराजने उन्हें दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे उन्मथ और प्रमाथ। वे दोनों कालके समान महापराक्रमी और महातेजस्वी थे ।। ३० ।।
सुभ्राजो भास्वरश्चैव यौ तौ सूर्यानुक्यायिनौ ।
तौ सूर्यः कार्तिकेयाय ददौ प्रीतः प्रतापवान् ।। ३१ ।।
सुभ्राज और भास्वर—जो सूर्यके अनुचर थे, उन्हें प्रतापी सूर्यने प्रसन्न होकर कार्तिकेयकी सेवामें दे दिया ।। ३१ ।।
कैलासशृङ्गसंकाशौ श्वेतमाल्यानुलेपनौ ।
सोमोऽप्यनुचरौ प्रादान्मणिं सुमणिमेव च ।। ३२ ।।
चन्द्रमाने भी कैलास-शिखरके समान श्वेतवर्णवाले तथा श्वेत माला और श्वेत चन्दन धारण करनेवाले दो अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम थे मणि और सुमणि ।।
ज्वालाजिह्वं तथा ज्योतिरात्मजाय हुताशनः ।
ददावनुचरौ शूरौ परसैन्यप्रमाथिनौ ।। ३३ ।।
अग्निदेवने भी अपने पुत्र स्कन्दको ज्वालाजिह्व तथा ज्योति नामक दो शूर सेवक प्रदान किये, जो शत्रुसेनाको मथ डालनेवाले थे ।। ३३ ।।
परिघं च वटं चैव भीमं च सुमहाबलम् ।
दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसम्मतौ ।। ३४ ।।
अंशोऽप्यनुचरान् पञ्च ददौ स्कन्दाय धीमते ।

अंशने भी बुद्धिमान् स्कन्दको पाँच अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम इस प्रकार हैं—परिघ, वट, महाबली भीम तथा दहति और दहन। इनमेंसे दहति और दहन बड़े प्रचण्ड तथा बल-पराक्रमकी दृष्टिसे सम्मानित थे।।

उत्क्रोशं पञ्चकं चैव वज्रदण्डधरावुभौ ।। ३५ ।।
ददावनलपुत्राय वासवः परवीरहा ।
तौ हि शत्रून् महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे बहून् ।। ३६ ।।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रने अग्निकुमार स्कन्दको उत्क्रोश और पंचक नामक दो अनुचर प्रदान किये। वे दोनों क्रमशः वज्र और दण्ड धारण करनेवाले थे। उन दोनोंने समरांगणमें इन्द्रके बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला था ।। ३५-३६ ।।

चक्रं विक्रमकं चैव संक्रमं च महाबलम् ।
स्कन्दाय त्रीननुचरान् ददौ विष्णुर्महायशाः ।। ३७ ।।
महायशस्वी भगवान् विष्णुने स्कन्दको चक्र, विक्रम और महाबली संक्रम—ये तीन अनुचर दिये ।। ३७ ।।

वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ ।
स्कन्दाय ददतुः प्रीतावश्विनौ भिषजां वरौ ।। ३८ ।।
सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण चिकित्सकचूड़ामणि अश्विनीकुमारोंने प्रसन्न होकर स्कन्दको वर्धन और नन्दन नामक दो सेवक दिये ।। ३८ ।।

कुन्दं च कुसुमं चैव कुमुदं च महायशाः ।
डम्बराडम्बरौ चैव ददौ धाता महात्मने ।। ३९ ।।
महायशस्वी धाताने महात्मा स्कन्दको कुन्द, कुसुम, कुमुद, डम्बर और आडम्बर—ये पाँच सेवक प्रदान किये ।। ३९ ।।

चक्रानुचक्रौ बलिनौ मेघचक्रौ बलोत्कटौ ।
ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ ।। ४० ।।
प्रजापति त्वष्टाने बलवान्, बलोन्मत्त, महामायावी और मेघचक्रधारी चक्र और अनुचक्र नामक दो अनुचर स्कन्दकी सेवामें उपस्थित किये ।। ४० ।।

सुव्रतं सत्यसंधं च ददौ मित्रो महात्मने ।
कुमाराय महात्मानौ तपोविद्याधरौ प्रभुः ।। ४१ ।।
सुदर्शनीयौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ।
भगवान् मित्रने महात्मा कुमारको सुव्रत और सत्यसंध नामक दो सेवक प्रदान किये। वे दोनों ही तप और विद्या धारण करनेवाले तथा महामनस्वी थे। इतना ही नहीं, वे देखनेमें बड़े ही सुन्दर, वर देनेमें समर्थ तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे ।। ४१ ½ ।।

सुव्रतं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च ।। ४२ ।।
कार्तिकेयाय सम्प्रादाद् विधाता लोकविश्रुतौ ।

विधाताने कार्तिकेयको महामना सुव्रत और सुकर्मा—ये दो लोकविख्यात सेवक प्रदान किये ।। ४२ १/२ ।।
पाणीतकं कालिकं च महामायाविनावुभौ ।। ४३ ।।
पूषा च पार्षदौ प्रादात् कार्तिकेयाय भारत ।
भरतनन्दन! पूषाने कार्तिकेयको पाणीतक और कालिक नामक दो पार्षद प्रदान किये। वे दोनों ही बड़े भारी मायावी थे ।। ४३ १/२ ।।
बलं चातिबलं चैव महावक्त्रौ महाबलौ ।। ४४ ।।
प्रददौ कार्तिकेयाय वायुर्भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ! वायु देवताने कृत्तिकाकुमारको महान् बलशाली एवं विशाल मुखवाले बल और अतिबल नामक दो सेवक प्रदान किये ।। ४४ १/२ ।।
यमं चातियमं चैव तिमिवक्त्रौ महाबलौ ।। ४५ ।।
प्रददौ कार्तिकेयाय वरुणः सत्यसङ्गरः ।
सत्यप्रतिज्ञ वरुणने कृत्तिकानन्दन स्कन्दको यम और अतियम नामक दो महाबली पार्षद दिये, जिनके मुख तिमि नामक महामत्स्यके समान थे ।। ४५ १/२ ।।
सुवर्चसं महात्मानं तथैवाप्यतिवर्चसम् ।। ४६ ।।
हिमवान् प्रददौ राजन् हुताशनसुताय वै ।
राजन्! हिमवान्ने अग्निकुमारको महामना सुवर्चा और अतिवर्चा नामक दो पार्षद प्रदान किये ।। ४६ १/२ ।।
काञ्चनं च महात्मानं मेघमालिनमेव च ।। ४७ ।।
ददावनुचरो मेरुरग्निपुत्राय भारत ।
भारत! मेरुने अग्निपुत्र स्कन्दको महामना कांचन और मेघमाली नामक दो अनुचर अर्पित किये ।। ४७ १/२ ।।
स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ ।। ४८ ।।
महात्मा त्वग्निपुत्राय महाबलपराक्रमौ ।
महामना मेरुने ही अग्निपुत्र कार्तिकेयको स्थिर और अतिस्थिर नामक दो पार्षद और दिये। वे दोनों महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे ।। ४८ १/२ ।।
उच्छृङ्गं चातिशृङ्गं च महापाषाणयोधिनौ ।। ४९ ।।
प्रददावग्निपुत्राय विन्ध्यः पारिषदावुभौ ।
विन्ध्य पर्वतने भी अग्निकुमारको दो पार्षद प्रदान किये, जिनके नाम थे उच्छृंग और अतिशृंग। वे दोनों ही बड़े-बड़े पत्थरोंकी चट्टानोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल थे ।।
संग्रहं विग्रहं चैव समुद्रोऽपि गदाधरौ ।। ५० ।।
प्रददावग्निपुत्राय महापारिषदावुभौ ।

समुद्रने भी अग्निपुत्रको दो गदाधारी महापार्षद दिये, जिनके नाम थे—संग्रह और विग्रह॥ ५०१/२॥ उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथैव च ॥ ५१ ॥ प्रददावग्निपुत्राय पार्वती शुभदर्शना । शुभदर्शना पार्वती देवीने अग्निपुत्रको तीन पार्षद दिये—उन्माद, शंकुकर्ण तथा पुष्पदन्त ॥ ५११/२॥ जयं महाजयं चैव नागौ ज्वलनसूनवे ॥ ५२ ॥ प्रददौ पुरुषव्याघ्र वासुकिः पन्नगेश्वरः । पुरुषसिंह! नागराज वासुकिने अग्निकुमारको पार्षदरूपसे जय और महाजय नामक दो नाग भेंट किये॥ एवं साध्याश्च रुद्राश्च वसवः पितरस्तथा ॥ ५३ ॥ सागराः सरितश्चैव गिरयश्च महाबलाः । ददुः सेनागणाध्यक्षान् शूलपट्टिशधारिणः ॥ ५४ ॥ दिव्यप्रहरणोपेतान् नानावेषविभूषितान् । इस प्रकार साध्य, रुद्र, वसु, पितृगण, समुद्र, सरिताओं और महाबली पर्वतोंने उन्हें विभिन्न सेनापति अर्पित किये, जो शूल, पट्टिश और नाना प्रकारके दिव्य आयुध धारण किये हुए थे। वे सब-के-सब भाँति-भाँतिकी वेश-भूषासे विभूषित थे॥ ५३-५४१/२॥ शृणु नामानि चाप्येषां येऽन्ये स्कन्दस्य सैनिकाः ॥ ५५ ॥ विविधायुधसम्पन्नाश्चित्राभरणभूषिताः । स्कन्दके जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न और विचित्र आभूषणोंसे विभूषित अन्य सैनिक थे, उनके नाम सुनो ॥ ५५१/२॥ शङ्कुकर्णो निकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥ ५६ ॥ अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ । घ्राणश्रवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षो जलन्धमः ॥ ५७ ॥ अक्षः संतर्जनो राजन् कुन्दीकस्तमोऽन्तकृत् । एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजटः प्रभुः ॥ ५८ ॥ सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः । पुण्यनामा सुनामा च सुचक्रः प्रियदर्शनः ॥ ५९ ॥ परिश्रुतः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः । अजोदरो गजशिराः स्कन्धाक्षः शतलोचनः ॥ ६० ॥ ज्वालाजिह्वः करालाक्षः शितिकेशो जटी हरिः । परिश्रुतः कोकनदः कृष्णकेशो जटाधरः ॥ ६१ ॥ चतुर्दंष्ट्रोऽष्टजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः ।

विद्युताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ॥ ६२ ॥
उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः ।
समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च ॥ ६३ ॥
वृषो मेषः प्रवाहश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ।
धूम्रः श्वेतः कलिङ्गश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ॥ ६४ ॥
प्रियकश्चैव नन्दश्च गोनन्दश्च प्रतापवान् ।
आनन्दश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ॥ ६५ ॥
क्षेमवाहः सुवाहश्च सिद्धपात्रश्च भारत ।
गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ॥ ६६ ॥
गायनो हसनश्चैव बाणः खड्गश्च वीर्यवान् ।
वैताली गलिताली च तथा कथकवातिकौ ॥ ६७ ॥
हंसजः पङ्कदिग्धाङ्गः समुद्रोन्मादनश्च ह ।
रणोत्कटः प्रहासश्च श्वेतसिद्धश्च नन्दनः ॥ ६८ ॥
कालकण्ठः प्रभासश्च तथा कुम्भाण्डकोदरः ।
कालकक्षः सितश्चैव भूतानां मथनस्तथा ॥ ६९ ॥
यज्ञवाहः सुवाहश्च देवयाजी च सोमपः ।
मज्जानश्च महातेजाः क्रथक्राथौ च भारत ॥ ७० ॥
तुहरश्च तुहारश्च चित्रदेवश्च वीर्यवान् ।
मधुरः सुप्रसादश्च किरीटी च महाबलः ॥ ७१ ॥
वत्सलो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च ।
धर्मदो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ७२ ॥
श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः ।
दण्डबाहुः सुबाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ॥ ७३ ॥
अचलः कनकाक्षश्च बालानामपि यः प्रभुः ।
संचारकः कोकनदो गृध्रपत्रश्च जम्बुकः ॥ ७४ ॥
लोहाजवक्त्रो जवनः कुम्भवक्त्रश्च कुम्भकः ।
स्वर्णग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च चन्द्रभः ॥ ७५ ॥
पाणिकूर्चश्च शम्बूकः पञ्चवक्त्रश्च शिक्षकः ।
चाषवक्त्रश्च जम्बूकः शाकवक्त्रश्च कुज्जलः ॥ ७६ ॥

शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, कुमुद, अनन्त, द्वादशभुज, कृष्ण, उपकृष्ण, घ्राणश्रवा, कपिस्कन्ध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्ष, संतर्जन, कुनदीक, तमोऽन्तकृत्, एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजट, प्रभु, सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, क्षतिकम्पन, पुण्यनामा, सुनामा, सुचक्र, प्रियदर्शन, परिश्रुत, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन, अजोदर, गजशिरा, स्कन्धाक्ष, शतलोचन,

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ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च द्वीपिर्सिंहानानास्तथा ।। ८२ ।।
किन्हीं-किन्हींके मुख मछली, मेढे, बकरी, भेड़, भैंसे, रीछ, व्याघ्र, भेड़िये तथा सिंहोंके समान थे ।। ८२ ।।
भीमा गजाननाश्चैव तथा नक्रमुखाश्च ये ।
गरुडाननाः कङ्कमुखा वृककाकमुखास्तथा ।। ८३ ।।
किन्हींके मुख हाथीके समान थे, इसलिये वे बड़े भयानक जान पड़ते थे। कुछ पार्षदोंके मुख मगर, गरुड़, कंक भेड़ियों और कौओंके समान जान पड़ते थे ।।
गोखरोष्ट्रमुखाश्चान्ये वृषदंशमुखास्तथा ।
महाजठरपादाङ्गास्तारकाक्षाश्च भारत ।। ८४ ।।
भारत! कुछ पार्षद गाय, गदहा, ऊँट और वनबिलावके समान मुख धारण करते थे। किन्हींके पेट, पैर और दूसरे-दूसरे अंग भी विशाल थे। उनकी आँखें तारोंके समान चमकती थीं ।। ८४ ।।
पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे ।
कोकिलाभानानश्चान्ये श्येनतित्तिरिकाननाः ।। ८५ ।।
कुछ पार्षदोंके मुख कबूतर, बैल, कोयल, बाज और तीतरोंके समान थे ।। ८५ ।।
कृकलासमुखाश्चैव विरजोऽम्बरधारिणः ।
व्यालवक्त्राः शूलमुखाश्चण्डवक्त्राः शुभाननाः ।। ८६ ।।
किन्हीं-किन्हींके मुख गिरगिटके समान जान पड़ते थे। कुछ बहुत ही श्वेत वस्त्र धारण करते थे। किन्हींके मुख सर्पोंके समान थे तो किन्हींके शूलके समान। किन्हींके मुखसे अत्यन्त क्रोध टपकता था और किन्हींके मुखपर सौम्यभाव छा रहा था ।। ८६ ।।
आशीविषाश्चीरधरा गोनासावदनास्तथा ।
स्थूलोदराः कृशाङ्गाश्च स्थूलाङ्गाश्च कृशोदराः ।। ८७ ।।
कुछ विषधर सर्पोंके समान जान पड़ते थे। कोई चीर धारण करते थे और किन्हीं-किन्हींके मुख गायके नथुनोंके समान प्रतीत होते थे। किन्हींके पेट बहुत मोटे थे और किन्हींके अत्यन्त कृश। कोई शरीरसे बहुत दुबले-पतले थे तो कोई महास्थूलकाय दिखायी देते थे ।।
ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणाः ।
गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ।। ८८ ।।
किन्हींकी गर्दन छोटी और कान बड़े-बड़े थे। नाना प्रकारके सर्पोंको उन्होंने आभूषणके रूपमें धारण कर रखा था। कोई अपने शरीरमें हाथीकी खाल लपेटे हुए थे तो कोई काला मृगछाला धारण करते थे ।। ८८ ।।
स्कन्धेमुखा महाराज तथाप्युदरतोमुखाः ।
पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जङ्घामुखा अपि ।। ८९ ।।

महाराज! किन्हींके मुख कंधोंपर थे तो किन्हींके पेटमें। कोई पीठमें, कोई दाढ़ीमें और कोई जाँघोंमें ही मुख धारण करते थे॥ ८९॥ पार्श्वाननाश्च बहवो नानादेशमुखास्तथा। तथा कीटपतङ्गानां सदृशास्या गणेश्वराः ॥ ९० ॥ बहुत-से ऐसे भी थे, जिनके मुख पार्श्वभागमें स्थित थे। शरीरके विभिन्न प्रदेशोंमें मुख धारण करनेवाले पार्षदोंकी संख्या भी कम नहीं थी। भिन्न-भिन्न गणोंके अधिपति कीट-पतंगोंके समान मुख धारण करते थे॥ नानाव्यालमुखाश्चान्ये बहुबाहुशिरोधराः। नानावृक्षभुजाः केचित् कटीशीर्षास्तथा परे ॥ ९१॥ किन्हींके अनेक और सर्पाकार मुख थे। किन्हीं-किन्हींके बहुत-सी भुजाएँ और गर्दनें थीं। किन्हींकी बहुसंख्यक भुजाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंके समान जान पड़ती थीं। किन्हीं-किन्हींके मस्तक उनके कटि-प्रदेशमें ही दिखायी देते थे॥ भुजङ्गभोगवदना नानागुल्मनिवासिनः। चीरसंवृतगात्राश्च नानाकनकवाससः॥ ९२॥ किन्हींके सर्पाकार मुख थे। कोई नाना प्रकारके गुल्मों और लताओंसे अपनेको आच्छादित किये हुए थे। कोई चीर वस्त्रसे ही अपनेको ढके हुए थे और कोई नाना प्रकारके सुनहरे वस्त्र धारण करते थे॥ ९२॥ नानावेषधराश्चैव नानामाल्यानुलेपनाः। नानावस्त्रधराश्चैव चर्मवासस एव च ॥ ९३ ॥ वे नाना प्रकारके वेश, भाँति-भाँतिकी माला और चन्दन तथा अनेक प्रकारके वस्त्र धारण करते थे। कोई-कोई चमड़ेका ही वस्त्र पहनते थे॥ ९३॥ उष्णीषिणो मुकुटिनः सुग्रीवाश्च सुवर्चसः। किरीटिनः पञ्चशिखास्तथा काञ्चनमूर्धजाः ॥ ९४ ॥ किन्हींके मस्तकपर पगड़ी थी तो किन्हींके सिरपर मुकुट शोभा पाते थे। किन्हींकी गर्दन और अंगकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी। कोई किरीट धारण करते और कोई सिरपर पाँच शिखाएँ रखते थे। किन्हींके सिरके बाल सुनहरे रंगके थे॥ ९४॥ त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखाः परे। शिखण्डिनो मुकुटिनो मुण्डाश्च जटिलास्तथा ॥ ९५ ॥ कोई दो, कोई तीन और कोई सात शिखाएँ रखते थे। कोई माथेपर मोरपंख और कोई मुकुट धारण करते थे। कोई मूँड़ मुड़ाये और कोई जटा बढ़ाये हुए थे॥ ९५॥ चित्रमालाधराः केचित् केचिद् रोमाननास्तथा। विग्रहैकरसा नित्यमजेयाः सुरसत्तमैः ॥ ९६ ॥

कोई विचित्र माला धारण किये हुए थे और किन्हींके मुखपर बहुत-से रोयें जमे हुए थे। उन सबको लड़ाई-झगड़ेमें ही रस आता था। वे सदा श्रेष्ठ देवताओंके लिये भी अजेय थे॥ ९६ ॥

कृष्णा निर्मांसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठास्तनूदराः ।
स्थूलपृष्ठा ह्रस्वपृष्ठाः प्रलम्बोदरमेहनाः ॥ ९७ ॥
कोई काले थे, किन्हींके मुखपर मांसरहित हड्डियोंका ढाँचामात्र था। किन्हींकी पीठ बहुत बड़ी थी और पेट भीतरको धँसा हुआ था। किन्हींकी पीठ मोटी और किन्हींकी छोटी थी। किन्हींके पेट और मूत्रेन्द्रिय दोनों बड़े थे॥ ९७ ॥

महाभुजा ह्रस्वभुजा ह्रस्वगात्राश्च वामनाः ।
कुब्जाश्च ह्रस्वजङ्घाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ॥ ९८ ॥
किन्हींकी भुजाएँ विशाल थीं तो किन्हींकी बहुत छोटी। कोई छोटे-छोटे अंगोंवाले और बौने थे। कोई कुबड़े थे तो किन्हीं-किन्हींकी जाँघें बहुत छोटी थीं। कोई हाथीके समान कान और गर्दन धारण करते थे॥ ९८ ॥

हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथा परे ।
दीर्घोच्छ्वासा दीर्घजङ्घा विकराला ह्यधोमुखाः ॥ ९९ ॥
किन्हींकी नाक हाथी-जैसी, किन्हींकी कछुओेंके समान और किन्हींकी भेड़ियों-जैसी थी। कोई लंबी साँस लेते थे। किन्हींकी जाँघें बहुत बड़ी थीं। किन्हींका मुख नीचेकी ओर था और वे विकराल दिखायी देते थे॥ ९९ ॥

महादंष्ट्राः ह्रस्वदंष्ट्राश्चतुर्दंष्ट्रास्तथा परे ।
वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये भीमा राजन् सहस्रशः ॥ १०० ॥
किन्हींकी दाढ़ें बड़ी, किन्हींकी छोटी और किन्हींकी चार थीं। राजन्! दूसरे भी सहस्रों पार्षद गजराजके समान विशालकाय एवं भयंकर थे॥ १०० ॥

सुविभक्तशरीराश्च दीप्तिमन्तः स्वलंकृताः ।
पिङ्गाक्षाः शङ्कुकर्णाश्च रक्तनासाश्च भारत ॥ १०१ ॥
उनके शरीरके सभी अंग सुन्दर विभागपूर्वक देखे जाते थे। वे दीप्तिमान् तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे। भारत! उनके नेत्र पिंगलवर्णके थे, कान शंकुके समान जान पड़ते थे और नासिका लाल रंगकी थी॥ १०१ ॥

पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलौष्ठा हरिमूर्धजाः ।
नानापादौष्ठदंष्ट्राश्च नानाहस्तशिरोधराः ॥ १०२ ॥
किन्हींकी दाढ़ें बड़ी और किन्हींकी मोटी थीं। किन्हींके ओठ मोटे और सिरके बाल नीले थे। किन्हींके पैर, ओठ, दाढ़ें, हाथ और गर्दनें नाना प्रकारकी और अनेक थीं॥ १०२ ॥

नानाचर्मभिराच्छन्ना नानाभाषाश्च भारत ।

कुशला देशभाषासु जल्पन्तोऽन्योन्यमीश्वराः ॥ १०३ ॥
भारत! कुछ लोग नाना प्रकारके चर्ममय वस्त्रोंसे आच्छादित, नाना प्रकारकी भाषाएँ बोलनेवाले, देशकी सभी भाषाओंमें कुशल एवं परस्पर बातचीत करनेमें समर्थ थे ॥ १०३ ॥
हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापारिषदास्तथा ।
दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥ १०४ ॥
वे महापार्षदगण हर्षमें भरकर चारों ओरसे दौड़े चले आ रहे थे। उनकी ग्रीवा, मस्तक, हाथ, पैर और नख सभी बड़े-बड़े थे ॥ १०४ ॥
पिङ्गाक्षा नीलकण्ठाश्च लम्बकर्णाश्च भारत ।
वृकोदरनिभाश्चैव केचिदञ्जनसंनिभाः ॥ १०५ ॥
भरतनन्दन! उनकी आँखें भूरी थीं, कण्ठमें नीले रंगका चिह्न था और कान लंबे-लंबे थे। किन्हींका रंग भेड़ियोंके उदरके समान था तो कोई काजलके समान काले थे ॥ १०५ ॥
श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिङ्गाक्षाश्च तथा परे ।
कल्माषा बहवो राजंश्चित्रवर्णाश्च भारत ॥ १०६ ॥
किन्हींकी आँखें सफेद और गर्दन लाल थीं। कुछ लोगोंके नेत्र पिंगलवर्णके थे। भरतवंशी नरेश! बहुत-से पार्षद विचित्र वर्णवाले और चितकबरे थे ॥ १०६ ॥
चामरापीडकनिभाः श्वेतलोहितराजयः ।
नानावर्णाः सवर्णाश्च मयूरसदृशप्रभाः ॥ १०७ ॥
कितने ही पार्षदोंके शरीरका रंग चँवर तथा फूलोंके मुकुट-सा सफेद था। कुछ लोगोंके अंगोंमें श्वेत और लाल रंगोंकी पंक्तियाँ दिखायी देती थीं। कुछ पार्षद एक-दूसरेसे भिन्न रंगके थे और बहुत-से समान रंगवाले भी थे। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति मोरोंके समान थी ॥ १०७ ॥
पुनः प्रहरणान्येषां कीर्त्यमानानि मे शृणु ।
शेषैः कृतः पारिषदैरायुधानां परिग्रहः ॥ १०८ ॥
अब शेष पार्षदोंने जिन आयुधोंको ग्रहण किया था, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो ॥ १०८ ॥
पाशोद्यतकराः केचिद् व्यादितास्याः खराननाः ।
पृष्ठाक्षा नीलकण्ठाश्च तथा परिघबाहवः ॥ १०९ ॥
कुछ पार्षद हाथोंमें पाश लिये हुए थे, कोई मुँह बाये खड़े थे, किन्हींके मुख गदहोंके समान थे, कितनोंकी आँखें पृष्ठभागमें थीं और कितनोंके कण्ठोंमें नील रंगका चिह्न था। बहुत-से पार्षदोंकी भुजाएँ ही परिघके समान थीं ॥ १०९ ॥
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणयः ।

असिमुद्गरहस्ताश्च दण्डहस्ताश्च भारत ।। ११० ।।
भरतनन्दन! किन्हींके हाथोंमें शतघ्नी थी तो किन्हींके चक्र। कोई हाथमें मुसल लिये हुए थे तो कोई तलवार, मुद्गर और डंडे लेकर खड़े थे ।। ११० ।।
गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपाणयः ।
आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महाजवाः ।। १११ ।।
किन्हींके हाथोंमें गदा, तोमर और भुशुण्डि शोभा पा रहे थे। वे महावेगशाली महामनस्वी पार्षद नाना प्रकारके भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे ।। १११ ।।
महाबला महावेगा महापारिषदास्तथा ।
अभिषेकं कुमारस्य दृष्ट्वा हृष्टा रणप्रियाः ।। ११२ ।।
उनका बल और वेग महान् था। वे युद्धप्रेमी महा-पार्षदगण कुमारका अभिषेक देखकर बड़े प्रसन्न हुए ।।
घण्टाजालपिनद्धाङ्गा ननृतुस्ते महौजसः ।
एते चान्ये च बहवो महापारिषदा नृप ।। ११३ ।।
उपतस्थुर्महात्मानं कार्तिकेयं यशस्विनम् ।
वे अपने अंगोंमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त जालीदार वस्त्र पहने हुए थे। उनमें महान् ओज भरा था। नरेश्वर! वे हर्षमें भरकर नृत्य कर रहे थे। ये तथा और भी बहुत-से महापार्षदगण यशस्वी महात्मा कार्तिकेयकी सेवामें उपस्थित हुए थे ।। ११३ १/२ ।।
दिव्याश्चाप्यान्तरिक्षाश्च पार्थिवाश्चानिलोपमाः ।। ११४ ।।
व्यादिष्टा देवतैः शूराः स्कन्दस्यानुचराभवन् ।
देवताओंकी आज्ञा पाकर देवलोक, अन्तरिक्षलोक तथा भूलोकके वायुतुल्य वेगशाली शूरवीर पार्षद स्कन्दके अनुचर हुए थे ।। ११४ १/२ ।।
तादृशानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
अभिषिक्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ।। ११५ ।।
ऐसे-ऐसे सहस्रों, लाखों और अरबों पार्षद अभिषेकके पश्चात् महात्मा स्कन्दको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। ११५ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलरामतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने स्कन्दाभिषेके पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलरामजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दका अभिषेकविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।

* - एक प्रयुत दस लाखके बराबर होता है।

अध्याय (पृष्ठ 2815)

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षट्‌चत्वारिंशोऽध्यायः

मातृकाओंका परिचय तथा स्कन्ददेवकी रणयात्रा और उनके द्वारा तारकासुर, महिषासुर आदि दैत्योंका सेनासहित संहार

वैशम्पायन उवाच

शृणु मातृगणान् राजन् कुमारानुचरानिमान् ।
कीर्त्यमानान् मया वीर सपत्नगणसूदनान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—वीर नरेश! अब मैं उन मातृकाओंके नाम बता रहा हूँ, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली तथा कुमार कार्तिकेयकी अनुचरी हैं ॥ १ ॥
यशस्विनीनां मातॄणां शृणु नामानि भारत ।
याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्च भागशः ॥ २ ॥
भरतनन्दन! तुम उन यशस्वी मातृकाओंके नाम सुनो, जिन कल्याणकारिणी देवियोंने विभागपूर्वक तीनों लोकोंको व्याप्त कर रखा है ॥ २ ॥
प्रभावती विशालाक्षी पालिता गोस्तनी तथा ।
श्रीमती बहुला चैव तथैव बहुपुत्रिका ॥ ३ ॥
अप्सु जाता च गोपाली बृहदम्बालिका तथा ।
जयावती मालतिका ध्रुवरत्ना भयंकरी ॥ ४ ॥
वसुदामा च दामा च विशोका नन्दिनी तथा ।
एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्च भारत ॥ ५ ॥
उत्तेजनी जयत्सेना कमलाक्ष्यथ शोभना ।
शत्रुंजया तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ॥ ६ ॥
माधवी शुभवक्त्रा च तीर्थनेमिश्च भारत ।
गीतप्रिया च कल्याणी रुद्ररोमामिताशना ॥ ७ ॥
मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती ।
अलाताक्षी वीर्यवती विद्युज्जिह्वा च भारत ॥ ८ ॥
पद्मावती सुनक्षत्रा कन्दरा बहुयोजना ।
संतानिका च कौरव्य कमला च महाबला ॥ ९ ॥
सुदामा बहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी ।
नृत्यप्रिया च राजेन्द्र शतोतूलखलमेखला ॥ १० ॥

शतघण्टा शतानन्दा भगनन्दा च भाविनी । वपुष्मती चन्द्रसीता भद्रकाली च भारत ॥ ११ ॥ ऋक्षाम्बिका निष्कुटिका वामा चत्वरवासिनी । सुमङ्गला स्वस्तिमती बुद्धिकामा जयप्रिया ॥ १२ ॥ धनदा सुप्रसादा च भवदा च जलेश्वरी । एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा ॥ १३ ॥ कण्डूतिः कालिका चैव देवमित्रा च भारत । वसुश्रीः कोटरा चैव चित्रसेना तथाचला ॥ १४ ॥ कुक्कुटिका शङ्खलिका तथा शकुनिका नृप । कुण्डारिका कौकुलिका कुम्भिकाथ शतोदरी ॥ १५ ॥ उत्क्राथिनी जलेला च महावेगा च कङ्कणा । मनोजवा कण्टकिनी प्रघसा पूतना तथा ॥ १६ ॥ केशयन्त्री त्रुटिर्वामा क्रोशनाथ तडित्प्रभा । मन्दोदरी च मुण्डी च कोटरा मेघवाहिनी ॥ १७ ॥ सुभगा लम्बनी लम्बा ताम्रचूडा विकाशिनी । ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला ॥ १८ ॥ पृथुवस्त्रा मधुलिका मधुकुम्भा तथैव च । पक्षालिका मत्कुलिका जरायुर्जर्जरानना ॥ १९ ॥ ख्याता दहदहा चैव तथा धमधमा नृप । खण्डखण्डा च राजेन्द्र पूषणा मणिकुट्टिका ॥ २० ॥ अमोघा चैव कौरव्य तथा लम्बपयोधरा । वेणुवीणाधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला ॥ २१ ॥ शशोलूकमुखी कृष्णा खरजङ्घा महाजवा । शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा ॥ २२ ॥ जटालिका कामचरी दीर्घजिह्वा बलोत्कटा । कालेहिका वामनिका मुकुटा चैव भारत ॥ २३ ॥ लोहिताक्षी महाकाया हरिपिण्डा च भूमिप । एकत्वचा सुकुसुमा कृष्णकर्णी च भारत ॥ २४ ॥ क्षुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा । चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना ॥ २५ ॥ खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहास्वना । शङ्खकुम्भश्रवाश्चैव भगदा च महाबला ॥ २६ ॥ गणा च सुगणा चैव तथा भीत्यथ कामदा ।

चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरी ॥ २७ ॥
पशुदा वित्तदा चैव सुखदा च महायशाः ।
पयोदा गोमहिषदा सुविशाला च भारत ॥ २८ ॥
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुरोचना ।
नौकर्णी मुखकर्णी च विशिरा मन्थिनी तथा ॥ २९ ॥
एकचन्द्रा मेघकर्णी मेघमाला विरोचना ।

कुरुवंशी! भरतकुलनन्दन! राजेन्द्र! वे नाम इस प्रकार हैं—प्रभावती, विशालाक्षी, पालिता, गोस्तनी, श्रीमती, बहुला, बहुपुत्रिका, अप्सु जाता, गोपाली, बृहदम्बालिका, जयावती, मालतिका, ध्रुवरत्ना, भयंकरी, वसुदामा, दामा, विशोका, नन्दिनी, एकचूड़ा, महाचूड़ा, चक्रनेमि, उत्तेजनी, जयत्सेना, कमलाक्षी, शोभना, शत्रुंजया, क्रोधना, शलभी, खरी, माधवी, शुभवक्त्रा, तीर्थनेमि, गीतप्रिया, कल्याणी, रुद्ररोमा, अमिताशना, मेघस्वना, भोगवती, सुभ्रू, कनकावती, अलाताक्षी, वीर्यवती, विद्युज्जिह्वा, पद्मावती, सुनक्षत्रा, कन्दरा, बहुयोजना, संतानिका, कमला, महाबला, सुदामा, बहुदामा, सुप्रभा, यशस्विनी, नृत्यप्रिया, शतोदूखलमेखला, शतघण्टा, शतानन्दा, भगनन्दा, भाविनी, वपुष्मती, चन्द्रसीता, भद्रकाली, ऋक्षाम्बिका, निष्कुटिका, वामा, चत्वरवासिनी, सुमंगला, स्वस्तिमती, बुद्धिकामा, जयप्रिया, धनदा, सुप्रसादा, भवदा, जलेश्वरी, एडी, भेडी, समेडी, वेतालजननी, कण्डूतिकालिका, देवमित्रा, वसुश्री, कोटरा, चित्रसेना, अचला, कुक्कुटिका, शंखलिका, शकुनिका, कुण्डारिका, कौकुलिका, कुम्भिका, शतोदरी, उत्क्राथिनी, जलेला, महावेगा, कंकणा, मनोजवा, कण्टकिनी, प्रघसा, पूतना, केशयन्त्री, त्रुटि, वामा, क्रोशना तडित्प्रभा, मन्दोदरी, मुण्डी, कोटरा, मेघवाहिनी, सुभगा, लम्बिनी, लम्बा, ताम्रचूड़ा, विकाशिनी, ऊर्ध्ववेणीधरा, पिंगाक्षी, लोहमेखला, पृथुवस्त्रा, मधुलिका, मधुकुम्भा, पक्षालिका, मत्कुलिका, जरायु, जर्जरानना, ख्याता, दहदहा, धमधमा, खण्डखण्डा, पूषणा, मणिकुट्टिका, अमोला, लम्बपयोधरा, वेणुवीणाधरा, पिंगाक्षी, लोहमेखला, शशोलूकमुखी, कृष्णा, खरजंघा, महाजवा, शिशुमारमुखी, श्वेता, लोहिताक्षी, विभीषणा, जटालिका, कामचरी, दीर्घजिह्वा, बलोत्कटा, कालेहिका, वामनिका, मुकुटा, लोहिताक्षी, महाकाया, हरिपिण्डा, एकत्वचा, सुकुसुमा, कृष्णकर्णी, क्षुरकर्णी, चतुष्कर्णी, कर्णप्रावरणा, चतुष्पथनिकेता, गोकर्णी, महिषानना, खरकर्णी, महाकर्णी, भेरीस्वना, महास्वना, शंखश्रवा, कुम्भश्रवा, भगदा, महाबला, गणा, सुगणा, अभीति, कामदा, चतुष्पथरता, भूतितीर्था, अन्यगोचरी, पशुदा, वित्तदा, सुखदा, महायशा, पयोदा, गोदा, महिषदा, सुविशाला, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, रोचमाना, सुरोचना, नौकर्णी, मुखकर्णी, विशिरा, मन्थिनी, एकचन्द्रा, मेघकर्णी, मेघमाला और विरोचना ।। ३—२९ ½ ।।

एताश्चान्याश्च बहवो मातरो भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कार्तिकेयानुयायिन्यो नानारूपाः सहस्रशः ।

भरतश्रेष्ठ! ये तथा और भी नाना रूपधारिणी बहुत-सी सहस्रों मातृकाएँ हैं, जो कुमार कार्तिकेयका अनुसरण करती हैं ॥ ३० १/२ ॥
दीर्घनख्यो दीर्घदन्त्यो दीर्घतुण्ड्यश्च भारत ॥ ३१ ॥
सबला मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलंकृताः ।
माहात्म्येन च संयुक्ताः कामरूपधरास्तथा ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! इनके नख, दाँत और मुख सभी विशाल हैं। वे सबला, मधुरा (सुन्दरी), युवावस्थासे सम्पन्न तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हैं। इनकी बड़ी महिमा है। ये अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाली हैं ॥ ३१-३२ ॥
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा काञ्चनसंनिभाः ।
कृष्णमेघनिभाश्चान्या धूम्राश्च भरतर्षभ ॥ ३३ ॥
इनमेंसे कुछ मातृकाओंके शरीर केवल हड्डियोंके ढाँचे हैं। उनमें मांसका पता नहीं है। कुछ श्वेतवर्णकी हैं और कितनोंकी ही अंगकान्ति सुवर्णके समान है। भरतश्रेष्ठ! कुछ मातृकाएँ कृष्णमेघके समान काली तथा कुछ धूम्रवर्णकी हैं ॥ ३३ ॥
अरुणाभा महाभोगा दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ।
ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिङ्गाक्ष्यो लम्बमेखलाः ॥ ३४ ॥
कितनोंकी कान्ति अरुणवर्णकी है। वे सभी महान् भोगोंसे सम्पन्न हैं। उनके केश बड़े-बड़े और वस्त्र उज्ज्वल हैं। वे ऊपरकी ओर वेणी धारण करनेवाली, भूरी आँखोंसे सुशोभित तथा लम्बी मेखलासे अलंकृत हैं ॥
लम्बोदर्यो लम्बकर्णास्तथा लम्बपयोधराः ।
ताम्राक्ष्यस्ताम्रवर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथा पराः ॥ ३५ ॥
उनमेंसे किन्हींके उदर, किन्हींके कान तथा किन्हींके दोनों स्तन लंबे हैं। कितनोंकी आँखें ताँबेके समान लाल रंगकी हैं। कुछ मातृकाओंके शरीरकी कान्ति भी ताम्रवर्णकी हैं। बहुतोंकी आँखें काले रंगकी हैं ॥ ३५ ॥
वरदाः कामचारिण्यो नित्यं प्रमुदितास्तथा ।
याम्या रौद्रास्तथा सौम्याः कौबेर्योऽथ महाबलाः ॥ ३६ ॥
वारुण्योऽथ च माहेन्द्र्यस्तथाऽऽग्नेय्यः परंतप ।
वायव्याश्चाथ कौमार्यो ब्राह्मयश्च भरतर्षभ ॥ ३७ ॥
वैष्णव्यश्च तथा सौर्यो वाराह्यश्च महाबलाः ।
रूपेणाप्सरसां तुल्या मनोहार्यो मनोरमाः ॥ ३८ ॥
वे वर देनेमें समर्थ, अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाली और सदा आनन्दमें निमग्न रहनेवाली हैं। शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतश्रेष्ठ! उन मातृकाओंमेंसे कुछ यमकी शक्तियाँ हैं, कुछ रुद्रकी। कुछ सोमकी शक्तियाँ हैं और कुछ कुबेरकी। वे सब-की-सब महान् बलसे सम्पन्न हैं। इसी तरह कुछ वरुणकी, कुछ देवराज इन्द्रकी, कुछ अग्नि, वायु, कुमार, ब्रह्मा,

विष्णु, सूर्य तथा भगवान् वराहकी महाबलशालिनी शक्तियाँ हैं, जो रूपमें अप्सराओंके समान मनोहारिणी और मनोरमा हैं॥ ३६—३८॥ परपुष्टोपमा वाक्ये तथर्द्ध्या धनदोपमाः। शक्रवीर्योपमा युद्धे दीप्त्या वह्निसमास्तथा॥ ३९॥ वे मीठी वाणी बोलनेमें कोयल और धनसमृद्धिमें कुबेरके समान हैं। युद्धमें इन्द्रके सदृश पराक्रम प्रकट करनेवाली तथा अग्निके समान तेजस्विनी हैं॥ ३९॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भयदास्ता भवन्त्युत। कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा॥ ४०॥ युद्ध छिड़ जानेपर वे सदा शत्रुओंके लिये भयदायिनी होती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली तथा वायुके समान वेगशालिनी हैं॥ ४०॥ अचिन्त्यबलवीर्याश्च तथाचिन्त्यपराक्रमाः। वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः॥ ४१॥ उनके बल, वीर्य और पराक्रम अचिन्त्य हैं। वे वृक्षों, चबूतरों और चौराहोंपर निवास करती हैं॥ ४१॥ गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालयाः। नानाभरणधारिण्यो नानामाल्याम्बरास्तथा॥ ४२॥ गुफाएँ, श्मशान, पर्वत और झरने भी उनके निवासस्थान हैं। वे नाना प्रकारके आभूषण, पुष्पहार और वस्त्र धारण करती हैं॥ ४२॥ नानाविचित्रवेषाश्च नानाभाषास्तथैव च। एते चान्ये च बहवो गणाः शत्रुभयंकराः॥ ४३॥ अनुजग्मुर्महात्मानं त्रिदशेन्द्रस्य सम्मते। उनके वेश नाना प्रकारके और विचित्र हैं। वे अनेक प्रकारकी भाषाएँ बोलती हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुओंको भयभीत करनेवाले गण देवेन्द्रकी सम्मतिसे महात्मा स्कन्दका अनुसरण करने लगे॥ ४३ १/२॥ ततः शक्त्यस्त्रमददद् भगवान् पाकशासनः॥ ४४॥ गुहाय राजशार्दूल विनाशाय सुरद्विषाम्। महास्वनां महाघण्टां द्योतमानां सितप्रभाम्॥ ४५॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् पाकशासनने देवद्रोहियोंके विनाशके लिये कुमार कार्तिकेयको शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। साथ ही उन्होंने बड़े जोरसे आवाज करनेवाला एक विशाल घंटा भी दिया, जो अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था॥ ४४-४५॥ अरुणादित्यवर्णां च पताकां भरतर्षभ। ददौ पशुपतिस्तस्मै सर्वभूतमहाचमूम्॥ ४६॥

भरतश्रेष्ठ! भगवान् पशुपतिने उन्हें अरुण और सूर्यके समान प्रकाशमान एक पताका और अपने सम्पूर्ण भूतगणोंकी विशाल सेना भी प्रदान की ॥ ४६ ॥ उग्रां नानाप्रहरणां तपोवीर्यबलान्विताम् । अजेयां स्वगणैर्युक्तां नाम्ना सेनां धनंजयाम् ॥ ४७ ॥ रुद्रतुल्यबलैर्युक्तां योधानामयुतैस्त्रिभिः । न सा विजानाति रणात् कदाचिद् विनिवर्तितुम् ॥ ४८ ॥ वह भयंकर सेना धनंजय नामसे विख्यात थी। उसमें सभी सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र, शस्त्र, तपस्या, बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। रुद्रके समान बलशाली तीस हजार रुद्रगणोंसे युक्त वह सेना शत्रुओंके लिये अजेय थी। वह कभी भी युद्धसे पीछे हटना जानती ही नहीं थी ॥ विष्णुर्ददौ वैजयन्तीं मालां बलविवर्धिनीम् । उमा ददौ विरजसी वाससी रविसप्रभे ॥ ४९ ॥ भगवान् विष्णुने कुमारको बल बढ़ानेवाली वैजयन्ती माला दी और उमाने सूर्यके समान चमकीले दो निर्मल वस्त्र प्रदान किये ॥ ४९ ॥ गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् । ददौ प्रीत्या कुमाराय दण्डं चैव बृहस्पतिः ॥ ५० ॥ गंगाने कुमारको प्रसन्नतापूर्वक एक दिव्य और उत्तम कमण्डलु दिया, जो अमृत प्रकट करनेवाला था। बृहस्पतिजीने दण्ड प्रदान किया ॥ ५० ॥ गरुडो दयितं पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् । अरुणस्ताम्रचूडं च प्रददौ चरणायुधम् ॥ ५१ ॥ गरुडने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना प्रिय पुत्र मयूर भेंट किया। अरुणने लाल शिखावाले अपने पुत्र ताम्रचूड (मुर्ग)-को समर्पित किया, जिसका पैर ही आयुध था ॥ नागं तु वरुणो राजा बलवीर्यसमन्वितम् । कृष्णाजिनं ततो ब्रह्मा ब्रह्मण्याय ददौ प्रभुः ॥ ५२ ॥ समरेषु जयं चैव प्रददौ लोकभावनः । राजा वरुणने बल और वीर्यसे सम्पन्न एक नाग भेंट किया और लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने ब्राह्मणहितैषी कुमारको काला मृगचर्म तथा युद्धमें विजयका आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ५२½ ॥ सेनापत्यमनुप्राप्य स्कन्दो देवगणस्य ह ॥ ५३ ॥ शुशुभे ज्वलितोऽर्चिष्मान् द्वितीय इव पावकः । देवताओंका सेनापतित्व पाकर तेजस्वी स्कन्द अपने तेजसे प्रज्वलित हो दूसरे अग्निदेवके समान सुशोभित होने लगे ॥ ५३½ ॥ ततः पारिषदैश्चैव मातृभिश्च समन्वितः ॥ ५४ ॥

ययौ दैत्यविनाशाय ह्लादयन् सुरपुङ्गवान् । तदनन्तर अपने पार्षदों तथा मातृकागणोंके साथ कुमार कार्तिकेयने देवेश्वरोंको आनन्द प्रदान करते हुए दैत्योंके विनाशके लिये प्रस्थान किया ॥ ५४½ ॥ सा सेना नैर्ऋती भीमा सघण्टोच्छ्रितकेतना ॥ ५५ ॥ सभेरीशङ्खमुरजा सायुधा सपताकिनी । शारदी द्यौरिवाभाति ज्योतिर्भिरिव शोभिता ॥ ५६ ॥ नैर्ऋतों (भूतगणों)-की वह भयंकर सेना घंटा, भेरी, शंख और मृदंगकी ध्वनिसे गूँज रही थी। उसकी ऊँचे उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं। अस्त्र-शस्त्रों और पताकाओंसे सम्पन्न वह विशाल वाहिनी नक्षत्रोंसे सुशोभित शरत्कालके आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥

ततो देवनिकायास्ते नानाभूतगणास्तथा । वादयामासुरव्यग्रा भेरीः शङ्खांश्च पुष्कलान् ॥ ५७ ॥ पटहान् झर्झरांश्चैव क्रकचान् गोविषाणकान् । आडम्बरान् गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ॥ ५८ ॥ तदनन्तर वे देवसमूह तथा नाना प्रकारके भूतगण शान्तचित्त हो भेरी, बहुत-से शंख, पटह, झाँझ, क्रकच, गोशृंग, आडम्बर, गोमुख और भारी आवाज करनेवाले नगाड़े बजाने लगे ॥ ५७-५८ ॥

तुष्टुवुस्ते कुमारं तु सर्वे देवाः सवासवाः । जगुश्च देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५९ ॥ फिर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता कुमारकी स्तुति करने लगे। देव-गन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ ५९ ॥

ततः प्रीतो महासेनस्त्रिदशेभ्यो वरं ददौ । रिपून् हन्तास्मि समरे ये वो वधचिकीर्षवः ॥ ६० ॥ इससे प्रसन्न होकर कुमार महासेनने देवताओंको यह वर दिया कि ‘जो आपलोगोंका वध करना चाहते हैं, आपके उन समस्त शत्रुओंका मैं समरांगणमें संहार कर डालूँगा’ ॥ ६० ॥

प्रतिगृह्य वरं देवास्तस्माद् विबुधसत्तमात् । प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान् रिपून् ॥ ६१ ॥ उन सुरश्रेष्ठ कुमारसे वह वर पाकर महामनस्वी देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओंको मरा हुआ ही मानने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वेषां भूतसंघानां हर्षन्नादः समुत्थितः । अपूरयत लोकांस्त्रीन् वरे दत्ते महात्मना ॥ ६२ ॥