महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2810, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! किन्हींके मुख कंधोंपर थे तो किन्हींके पेटमें। कोई पीठमें, कोई दाढ़ीमें और कोई जाँघोंमें ही मुख धारण करते थे॥ ८९॥ पार्श्वाननाश्च बहवो नानादेशमुखास्तथा। तथा कीटपतङ्गानां सदृशास्या गणेश्वराः ॥ ९० ॥ बहुत-से ऐसे भी थे, जिनके मुख पार्श्वभागमें स्थित थे। शरीरके विभिन्न प्रदेशोंमें मुख धारण करनेवाले पार्षदोंकी संख्या भी कम नहीं थी। भिन्न-भिन्न गणोंके अधिपति कीट-पतंगोंके समान मुख धारण करते थे॥ नानाव्यालमुखाश्चान्ये बहुबाहुशिरोधराः। नानावृक्षभुजाः केचित् कटीशीर्षास्तथा परे ॥ ९१॥ किन्हींके अनेक और सर्पाकार मुख थे। किन्हीं-किन्हींके बहुत-सी भुजाएँ और गर्दनें थीं। किन्हींकी बहुसंख्यक भुजाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंके समान जान पड़ती थीं। किन्हीं-किन्हींके मस्तक उनके कटि-प्रदेशमें ही दिखायी देते थे॥ भुजङ्गभोगवदना नानागुल्मनिवासिनः। चीरसंवृतगात्राश्च नानाकनकवाससः॥ ९२॥ किन्हींके सर्पाकार मुख थे। कोई नाना प्रकारके गुल्मों और लताओंसे अपनेको आच्छादित किये हुए थे। कोई चीर वस्त्रसे ही अपनेको ढके हुए थे और कोई नाना प्रकारके सुनहरे वस्त्र धारण करते थे॥ ९२॥ नानावेषधराश्चैव नानामाल्यानुलेपनाः। नानावस्त्रधराश्चैव चर्मवासस एव च ॥ ९३ ॥ वे नाना प्रकारके वेश, भाँति-भाँतिकी माला और चन्दन तथा अनेक प्रकारके वस्त्र धारण करते थे। कोई-कोई चमड़ेका ही वस्त्र पहनते थे॥ ९३॥ उष्णीषिणो मुकुटिनः सुग्रीवाश्च सुवर्चसः। किरीटिनः पञ्चशिखास्तथा काञ्चनमूर्धजाः ॥ ९४ ॥ किन्हींके मस्तकपर पगड़ी थी तो किन्हींके सिरपर मुकुट शोभा पाते थे। किन्हींकी गर्दन और अंगकान्ति बड़ी ही सुन्दर थी। कोई किरीट धारण करते और कोई सिरपर पाँच शिखाएँ रखते थे। किन्हींके सिरके बाल सुनहरे रंगके थे॥ ९४॥ त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखाः परे। शिखण्डिनो मुकुटिनो मुण्डाश्च जटिलास्तथा ॥ ९५ ॥ कोई दो, कोई तीन और कोई सात शिखाएँ रखते थे। कोई माथेपर मोरपंख और कोई मुकुट धारण करते थे। कोई मूँड़ मुड़ाये और कोई जटा बढ़ाये हुए थे॥ ९५॥ चित्रमालाधराः केचित् केचिद् रोमाननास्तथा। विग्रहैकरसा नित्यमजेयाः सुरसत्तमैः ॥ ९६ ॥