महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2811, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोई विचित्र माला धारण किये हुए थे और किन्हींके मुखपर बहुत-से रोयें जमे हुए थे। उन सबको लड़ाई-झगड़ेमें ही रस आता था। वे सदा श्रेष्ठ देवताओंके लिये भी अजेय थे॥ ९६ ॥
कृष्णा निर्मांसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठास्तनूदराः ।
स्थूलपृष्ठा ह्रस्वपृष्ठाः प्रलम्बोदरमेहनाः ॥ ९७ ॥
कोई काले थे, किन्हींके मुखपर मांसरहित हड्डियोंका ढाँचामात्र था। किन्हींकी पीठ बहुत बड़ी थी और पेट भीतरको धँसा हुआ था। किन्हींकी पीठ मोटी और किन्हींकी छोटी थी। किन्हींके पेट और मूत्रेन्द्रिय दोनों बड़े थे॥ ९७ ॥
महाभुजा ह्रस्वभुजा ह्रस्वगात्राश्च वामनाः ।
कुब्जाश्च ह्रस्वजङ्घाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ॥ ९८ ॥
किन्हींकी भुजाएँ विशाल थीं तो किन्हींकी बहुत छोटी। कोई छोटे-छोटे अंगोंवाले और बौने थे। कोई कुबड़े थे तो किन्हीं-किन्हींकी जाँघें बहुत छोटी थीं। कोई हाथीके समान कान और गर्दन धारण करते थे॥ ९८ ॥
हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथा परे ।
दीर्घोच्छ्वासा दीर्घजङ्घा विकराला ह्यधोमुखाः ॥ ९९ ॥
किन्हींकी नाक हाथी-जैसी, किन्हींकी कछुओेंके समान और किन्हींकी भेड़ियों-जैसी थी। कोई लंबी साँस लेते थे। किन्हींकी जाँघें बहुत बड़ी थीं। किन्हींका मुख नीचेकी ओर था और वे विकराल दिखायी देते थे॥ ९९ ॥
महादंष्ट्राः ह्रस्वदंष्ट्राश्चतुर्दंष्ट्रास्तथा परे ।
वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये भीमा राजन् सहस्रशः ॥ १०० ॥
किन्हींकी दाढ़ें बड़ी, किन्हींकी छोटी और किन्हींकी चार थीं। राजन्! दूसरे भी सहस्रों पार्षद गजराजके समान विशालकाय एवं भयंकर थे॥ १०० ॥
सुविभक्तशरीराश्च दीप्तिमन्तः स्वलंकृताः ।
पिङ्गाक्षाः शङ्कुकर्णाश्च रक्तनासाश्च भारत ॥ १०१ ॥
उनके शरीरके सभी अंग सुन्दर विभागपूर्वक देखे जाते थे। वे दीप्तिमान् तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे। भारत! उनके नेत्र पिंगलवर्णके थे, कान शंकुके समान जान पड़ते थे और नासिका लाल रंगकी थी॥ १०१ ॥
पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलौष्ठा हरिमूर्धजाः ।
नानापादौष्ठदंष्ट्राश्च नानाहस्तशिरोधराः ॥ १०२ ॥
किन्हींकी दाढ़ें बड़ी और किन्हींकी मोटी थीं। किन्हींके ओठ मोटे और सिरके बाल नीले थे। किन्हींके पैर, ओठ, दाढ़ें, हाथ और गर्दनें नाना प्रकारकी और अनेक थीं॥ १०२ ॥
नानाचर्मभिराच्छन्ना नानाभाषाश्च भारत ।