महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2812, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुशला देशभाषासु जल्पन्तोऽन्योन्यमीश्वराः ॥ १०३ ॥
भारत! कुछ लोग नाना प्रकारके चर्ममय वस्त्रोंसे आच्छादित, नाना प्रकारकी भाषाएँ बोलनेवाले, देशकी सभी भाषाओंमें कुशल एवं परस्पर बातचीत करनेमें समर्थ थे ॥ १०३ ॥
हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापारिषदास्तथा ।
दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥ १०४ ॥
वे महापार्षदगण हर्षमें भरकर चारों ओरसे दौड़े चले आ रहे थे। उनकी ग्रीवा, मस्तक, हाथ, पैर और नख सभी बड़े-बड़े थे ॥ १०४ ॥
पिङ्गाक्षा नीलकण्ठाश्च लम्बकर्णाश्च भारत ।
वृकोदरनिभाश्चैव केचिदञ्जनसंनिभाः ॥ १०५ ॥
भरतनन्दन! उनकी आँखें भूरी थीं, कण्ठमें नीले रंगका चिह्न था और कान लंबे-लंबे थे। किन्हींका रंग भेड़ियोंके उदरके समान था तो कोई काजलके समान काले थे ॥ १०५ ॥
श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिङ्गाक्षाश्च तथा परे ।
कल्माषा बहवो राजंश्चित्रवर्णाश्च भारत ॥ १०६ ॥
किन्हींकी आँखें सफेद और गर्दन लाल थीं। कुछ लोगोंके नेत्र पिंगलवर्णके थे। भरतवंशी नरेश! बहुत-से पार्षद विचित्र वर्णवाले और चितकबरे थे ॥ १०६ ॥
चामरापीडकनिभाः श्वेतलोहितराजयः ।
नानावर्णाः सवर्णाश्च मयूरसदृशप्रभाः ॥ १०७ ॥
कितने ही पार्षदोंके शरीरका रंग चँवर तथा फूलोंके मुकुट-सा सफेद था। कुछ लोगोंके अंगोंमें श्वेत और लाल रंगोंकी पंक्तियाँ दिखायी देती थीं। कुछ पार्षद एक-दूसरेसे भिन्न रंगके थे और बहुत-से समान रंगवाले भी थे। किन्हीं-किन्हींकी कान्ति मोरोंके समान थी ॥ १०७ ॥
पुनः प्रहरणान्येषां कीर्त्यमानानि मे शृणु ।
शेषैः कृतः पारिषदैरायुधानां परिग्रहः ॥ १०८ ॥
अब शेष पार्षदोंने जिन आयुधोंको ग्रहण किया था, उनके नाम बता रहा हूँ, सुनो ॥ १०८ ॥
पाशोद्यतकराः केचिद् व्यादितास्याः खराननाः ।
पृष्ठाक्षा नीलकण्ठाश्च तथा परिघबाहवः ॥ १०९ ॥
कुछ पार्षद हाथोंमें पाश लिये हुए थे, कोई मुँह बाये खड़े थे, किन्हींके मुख गदहोंके समान थे, कितनोंकी आँखें पृष्ठभागमें थीं और कितनोंके कण्ठोंमें नील रंगका चिह्न था। बहुत-से पार्षदोंकी भुजाएँ ही परिघके समान थीं ॥ १०९ ॥
शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणयः ।