महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2804, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंशने भी बुद्धिमान् स्कन्दको पाँच अनुचर प्रदान किये, जिनके नाम इस प्रकार हैं—परिघ, वट, महाबली भीम तथा दहति और दहन। इनमेंसे दहति और दहन बड़े प्रचण्ड तथा बल-पराक्रमकी दृष्टिसे सम्मानित थे।।
उत्क्रोशं पञ्चकं चैव वज्रदण्डधरावुभौ ।। ३५ ।।
ददावनलपुत्राय वासवः परवीरहा ।
तौ हि शत्रून् महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे बहून् ।। ३६ ।।
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले इन्द्रने अग्निकुमार स्कन्दको उत्क्रोश और पंचक नामक दो अनुचर प्रदान किये। वे दोनों क्रमशः वज्र और दण्ड धारण करनेवाले थे। उन दोनोंने समरांगणमें इन्द्रके बहुत-से शत्रुओंका संहार कर डाला था ।। ३५-३६ ।।
चक्रं विक्रमकं चैव संक्रमं च महाबलम् ।
स्कन्दाय त्रीननुचरान् ददौ विष्णुर्महायशाः ।। ३७ ।।
महायशस्वी भगवान् विष्णुने स्कन्दको चक्र, विक्रम और महाबली संक्रम—ये तीन अनुचर दिये ।। ३७ ।।
वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ ।
स्कन्दाय ददतुः प्रीतावश्विनौ भिषजां वरौ ।। ३८ ।।
सम्पूर्ण विद्याओंमें प्रवीण चिकित्सकचूड़ामणि अश्विनीकुमारोंने प्रसन्न होकर स्कन्दको वर्धन और नन्दन नामक दो सेवक दिये ।। ३८ ।।
कुन्दं च कुसुमं चैव कुमुदं च महायशाः ।
डम्बराडम्बरौ चैव ददौ धाता महात्मने ।। ३९ ।।
महायशस्वी धाताने महात्मा स्कन्दको कुन्द, कुसुम, कुमुद, डम्बर और आडम्बर—ये पाँच सेवक प्रदान किये ।। ३९ ।।
चक्रानुचक्रौ बलिनौ मेघचक्रौ बलोत्कटौ ।
ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ ।। ४० ।।
प्रजापति त्वष्टाने बलवान्, बलोन्मत्त, महामायावी और मेघचक्रधारी चक्र और अनुचक्र नामक दो अनुचर स्कन्दकी सेवामें उपस्थित किये ।। ४० ।।
सुव्रतं सत्यसंधं च ददौ मित्रो महात्मने ।
कुमाराय महात्मानौ तपोविद्याधरौ प्रभुः ।। ४१ ।।
सुदर्शनीयौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ।
भगवान् मित्रने महात्मा कुमारको सुव्रत और सत्यसंध नामक दो सेवक प्रदान किये। वे दोनों ही तप और विद्या धारण करनेवाले तथा महामनस्वी थे। इतना ही नहीं, वे देखनेमें बड़े ही सुन्दर, वर देनेमें समर्थ तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे ।। ४१ ½ ।।
सुव्रतं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च ।। ४२ ।।
कार्तिकेयाय सम्प्रादाद् विधाता लोकविश्रुतौ ।