महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2819, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णु, सूर्य तथा भगवान् वराहकी महाबलशालिनी शक्तियाँ हैं, जो रूपमें अप्सराओंके समान मनोहारिणी और मनोरमा हैं॥ ३६—३८॥ परपुष्टोपमा वाक्ये तथर्द्ध्या धनदोपमाः। शक्रवीर्योपमा युद्धे दीप्त्या वह्निसमास्तथा॥ ३९॥ वे मीठी वाणी बोलनेमें कोयल और धनसमृद्धिमें कुबेरके समान हैं। युद्धमें इन्द्रके सदृश पराक्रम प्रकट करनेवाली तथा अग्निके समान तेजस्विनी हैं॥ ३९॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भयदास्ता भवन्त्युत। कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा॥ ४०॥ युद्ध छिड़ जानेपर वे सदा शत्रुओंके लिये भयदायिनी होती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली तथा वायुके समान वेगशालिनी हैं॥ ४०॥ अचिन्त्यबलवीर्याश्च तथाचिन्त्यपराक्रमाः। वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः॥ ४१॥ उनके बल, वीर्य और पराक्रम अचिन्त्य हैं। वे वृक्षों, चबूतरों और चौराहोंपर निवास करती हैं॥ ४१॥ गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालयाः। नानाभरणधारिण्यो नानामाल्याम्बरास्तथा॥ ४२॥ गुफाएँ, श्मशान, पर्वत और झरने भी उनके निवासस्थान हैं। वे नाना प्रकारके आभूषण, पुष्पहार और वस्त्र धारण करती हैं॥ ४२॥ नानाविचित्रवेषाश्च नानाभाषास्तथैव च। एते चान्ये च बहवो गणाः शत्रुभयंकराः॥ ४३॥ अनुजग्मुर्महात्मानं त्रिदशेन्द्रस्य सम्मते। उनके वेश नाना प्रकारके और विचित्र हैं। वे अनेक प्रकारकी भाषाएँ बोलती हैं। ये तथा और भी बहुत-से शत्रुओंको भयभीत करनेवाले गण देवेन्द्रकी सम्मतिसे महात्मा स्कन्दका अनुसरण करने लगे॥ ४३ १/२॥ ततः शक्त्यस्त्रमददद् भगवान् पाकशासनः॥ ४४॥ गुहाय राजशार्दूल विनाशाय सुरद्विषाम्। महास्वनां महाघण्टां द्योतमानां सितप्रभाम्॥ ४५॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर भगवान् पाकशासनने देवद्रोहियोंके विनाशके लिये कुमार कार्तिकेयको शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। साथ ही उन्होंने बड़े जोरसे आवाज करनेवाला एक विशाल घंटा भी दिया, जो अपनी उज्ज्वल प्रभासे प्रकाशित हो रहा था॥ ४४-४५॥ अरुणादित्यवर्णां च पताकां भरतर्षभ। ददौ पशुपतिस्तस्मै सर्वभूतमहाचमूम्॥ ४६॥