भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2821

ययौ दैत्यविनाशाय ह्लादयन् सुरपुङ्गवान् । तदनन्तर अपने पार्षदों तथा मातृकागणोंके साथ कुमार कार्तिकेयने देवेश्वरोंको आनन्द प्रदान करते हुए दैत्योंके विनाशके लिये प्रस्थान किया ॥ ५४½ ॥ सा सेना नैर्ऋती भीमा सघण्टोच्छ्रितकेतना ॥ ५५ ॥ सभेरीशङ्खमुरजा सायुधा सपताकिनी । शारदी द्यौरिवाभाति ज्योतिर्भिरिव शोभिता ॥ ५६ ॥ नैर्ऋतों (भूतगणों)-की वह भयंकर सेना घंटा, भेरी, शंख और मृदंगकी ध्वनिसे गूँज रही थी। उसकी ऊँचे उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं। अस्त्र-शस्त्रों और पताकाओंसे सम्पन्न वह विशाल वाहिनी नक्षत्रोंसे सुशोभित शरत्कालके आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी ॥

ततो देवनिकायास्ते नानाभूतगणास्तथा । वादयामासुरव्यग्रा भेरीः शङ्खांश्च पुष्कलान् ॥ ५७ ॥ पटहान् झर्झरांश्चैव क्रकचान् गोविषाणकान् । आडम्बरान् गोमुखांश्च डिण्डिमांश्च महास्वनान् ॥ ५८ ॥ तदनन्तर वे देवसमूह तथा नाना प्रकारके भूतगण शान्तचित्त हो भेरी, बहुत-से शंख, पटह, झाँझ, क्रकच, गोशृंग, आडम्बर, गोमुख और भारी आवाज करनेवाले नगाड़े बजाने लगे ॥ ५७-५८ ॥

तुष्टुवुस्ते कुमारं तु सर्वे देवाः सवासवाः । जगुश्च देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ५९ ॥ फिर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता कुमारकी स्तुति करने लगे। देव-गन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ ५९ ॥

ततः प्रीतो महासेनस्त्रिदशेभ्यो वरं ददौ । रिपून् हन्तास्मि समरे ये वो वधचिकीर्षवः ॥ ६० ॥ इससे प्रसन्न होकर कुमार महासेनने देवताओंको यह वर दिया कि ‘जो आपलोगोंका वध करना चाहते हैं, आपके उन समस्त शत्रुओंका मैं समरांगणमें संहार कर डालूँगा’ ॥ ६० ॥

प्रतिगृह्य वरं देवास्तस्माद् विबुधसत्तमात् । प्रीतात्मानो महात्मानो मेनिरे निहतान् रिपून् ॥ ६१ ॥ उन सुरश्रेष्ठ कुमारसे वह वर पाकर महामनस्वी देवता बड़े प्रसन्न हुए और अपने शत्रुओंको मरा हुआ ही मानने लगे ॥ ६१ ॥

सर्वेषां भूतसंघानां हर्षन्नादः समुत्थितः । अपूरयत लोकांस्त्रीन् वरे दत्ते महात्मना ॥ ६२ ॥