महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2822, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहात्मा कुमारके वर देनेपर सम्पूर्ण भूतसमुदायोंने जो हर्षनाद किया, वह तीनों
लोकोंमें गूँज उठा ।। ६२ ।।
स निर्ययौ महासेनो महत्या सेनया वृतः ।
वधाय युधि दैत्यानां रक्षार्थं च दिवौकसाम् ।। ६३ ।।
तत्पश्चात् विशाल सेनासे घिरे हुए स्वामी महासेन युद्धमें दैत्योंका वध और देवताओंकी
रक्षा करनेके लिये आगे बढ़े ।। ६३ ।।
व्यवसायो जयो धर्मः सिद्धिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः ।
महासेनस्य सैन्यानामग्रे जग्मुर्नर्राधिप ।। ६४ ।।
नरेश्वर! उस समय व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), विजय, धर्म, सिद्धि, लक्ष्मी, धृति और स्मृति
—ये सब-के-सब महासेनके सैनिकोंके आगे-आगे चलने लगे ।।
स तया भीमया देवः शूलमुद्गरहस्तया ।
ज्वलितालातधारिण्या चित्राभरणवर्मया ।। ६५ ।।
गदामुसलनाराचशक्तितोमरहस्तया ।
दृप्तसिंहनिनादिन्या विनद्य प्रययौ गृहः ।। ६६ ।।
वह सेना बड़ी भयंकर थी। उसने हाथोंमें शूल, मुद्गर, जलते हुए काठ, गदा, मुसल,
नाराच, शक्ति और तोमर धारण कर रखे थे। सारी सेना विचित्र आभूषणों और कवचोंसे
सुसज्जित थी तथा दर्पयुक्त सिंहके समान दहाड़ रही थी, उस सेनाके साथ सिंहनाद करके
कुमार कार्तिकेय युद्धके लिये प्रस्थित हुए ।।
तं दृष्ट्वा सर्वदैतेया राक्षसा दानवास्तथा ।
व्यद्रवन्त दिशः सर्वा भयोद्विग्नाः समन्ततः ।। ६७ ।।
उन्हें देखकर सम्पूर्ण दैत्य, दानव और राक्षस भयसे उद्विग्न हो सारी दिशाओंमें सब
ओर भाग गये ।। ६७ ।।
अभ्यद्रवन्त देवास्तान् विविधायुधपाणयः ।
दृष्ट्वा च स ततः क्रुद्धः स्कन्दस्तेजोबलान्वितः ।। ६८ ।।
शक्त्यस्त्रं भगवान् भीमं पुनः पुनरवाकिरत् ।
आदधच्चात्मनस्तेजो हविषेद्ध इवानलः ।। ६९ ।।
देवता अपने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र ले उन दैत्योंका पीछा करने लगे। यह
सब देखकर तेज और बलसे सम्पन्न भगवान् स्कन्द कुपित हो उठे और शक्ति नामक
भयानक अस्त्रका बारंबार प्रयोग करने लगे। उन्होंने उसमें अपना तेज स्थापित कर दिया
था और वे उस समय घीसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।।
अभ्यस्यमाने शक्त्यस्त्रे स्कन्देनामिततेजसा ।
उल्काज्वाला महाराज पपात वसुधातले ।। ७० ।।