महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2823, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! अमित तेजस्वी स्कन्दके द्वारा शक्तिका बारंबार प्रयोग होनेसे पृथ्वीपर प्रज्वलित उल्का गिरने लगी ।। संह्लादयन्तश्च तथा निर्घाताश्चापतन् क्षितौ । यथान्तकालसमये सुघोराः स्युस्तथा नृप ।। ७१ ।। नरेश्वर! जैसे प्रलयके समय अत्यन्त भयंकर वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ पृथ्वीपर गिरने लगते हैं, उसी प्रकार उस समय भी भीषण गर्जनाके साथ वज्रपात होने लगा ।। क्षिप्ता ह्येका यदा शक्तिः सुघोरानलसूनुना । ततः कोट्यो विनिष्पेतुः शक्तीनां भरतर्षभ ।। ७२ ।। भरतश्रेष्ठ! अग्निकुमारने जब एक बार अत्यन्त भयंकर शक्ति छोड़ी, तब उससे करोड़ों शक्तियाँ प्रकट होकर गिरने लगीं ।। ७२ ।। ततः प्रीतो महासेनो जघान भगवान् प्रभुः । दैत्येन्द्रं तारकं नाम महाबलपराक्रमम् ।। ७३ ।। वृतं दैत्यायुतैर्वीरैर्बलिभिर्दशभिर्नृप । इससे प्रभावशाली भगवान् महासेन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न उस दैत्यराज तारकको मार गिराया, जो एक लाख बलवान् एवं वीर दैत्योंसे घिरा हुआ था ।। ७३ ½ ।। महिषं चाष्टभिः पद्मैर्वृतं संख्ये निजघ्निवान् ।। ७४ ।। त्रिपादं चायुतशतैर्जघान दशभिर्वृतम् । ह्रदोदरं निखर्वैश्च वृतं दशभिरीश्वरः ।। ७५ ।। जघानानुचरैः सार्धं विविधायुधपाणिभिः । साथ ही उन्होंने युद्धस्थलमें आठ पद्म दैत्योंसे घिरे हुए महिषासुरका, दस लाख असुरोंसे सुरक्षित त्रिपादका और दस निखर्व दैत्य-योद्धाओंसे घिरे हुए ह्रदोदरका भी नाना प्रकारके आयुधधारी अनुचरोंसहित वध कर डाला ।। तथाकुर्वन्त विपुलं नादं वध्यत्सु शत्रुपु ।। ७६ ।। कुमारानुचरा राजन् पूरयन्तो दिशो दश । ननृतुश्च ववल्गुश्च जहसुश्च मुदान्विताः ।। ७७ ।। राजन्! जब शत्रु मारे जाने लगे, उस समय कुमारके अनुचर दसों दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इतना ही नहीं, वे आनन्दमग्न होकर नाचने, कूदने तथा जोर-जोरसे हँसने लगे ।। ७६-७७ ।। शक्त्यस्त्रस्य तु राजेन्द्र ततोऽर्चिर्भिः समन्ततः । त्रैलोक्यं त्रासितं सर्वं जृम्भमाणाभिरेव च ।। ७८ ।। राजेन्द्र! उस शक्तिनामक अस्त्रकी सब ओर फैलती हुई ज्वालाओंसे सारी त्रिलोकी थर्रा उठी ।। ७८ ।।