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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2824

दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे । पताकयावधूताश्च हताः केचित् सुरद्विषः ॥ ७९ ॥ सहस्रों दैत्य उस शक्तिकी आगमें जलकर भस्म हो गये। कितने ही स्कन्दके सिंहनादोंसे ही डरकर अपने प्राण खो बैठे तथा कुछ देवद्रोही उनकी पताकासे ही कम्पित होकर मर गये ॥ ७९ ॥

केचिद् घण्टारवत्रस्ता निषेदुर्वसुधातले । केचित् प्रहरणैश्छिन्ना विनिष्पेतुर्गतायुषः ॥ ८० ॥ कुछ दैत्य उनके घण्टानादसे संत्रस्त होकर धरतीपर बैठ गये और कुछ उनके आयुधोंसे छिन्न-भिन्न हो गतायु होकर पृथ्‍वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥

एवं सुरद्विषोऽनेकान् बलवानातातयिनः । जघान समरे वीरः कार्तिकेयो महाबलः ॥ ८१ ॥ इस प्रकार महाबली शक्तिशाली वीर कार्तिकेयने समरांगणमें अनेक आततायी देवद्रोहियोंका संहार कर डाला ॥

बाणो नामाथ दैतेयो बलेः पुत्रो महाबलः । क्रौञ्चं पर्वतमाश्रित्य देवसंघानबाधत ॥ ८२ ॥ राजा बलिका महाबली पुत्र बाणासुर क्रौंच पर्वतका आश्रय लेकर देवसमूहोंको कष्ट पहुँचाया करता था ॥ ८२ ॥

तमभ्यायान्महासेनः सुरशत्रुमुदारधीः । स कार्तिकेयस्य भयात् क्रौञ्चं शरणमीयिवान् ॥ ८३ ॥ उदारबुद्धि महासेनने उस दैत्यपर भी आक्रमण किया। तब वह कार्तिकेयके भयसे क्रौंच पर्वतकी शरणमें जा छिपा ॥

ततः क्रौञ्चं महामन्युः क्रौञ्चनादनिनादितम् । शक्त्या बिभेद भगवान् कार्तिकेयोऽग्निदत्तया ॥ ८४ ॥ इससे भगवान् कार्तिकेयको महान् क्रोध हुआ। उन्होंने अग्निकी दी हुई शक्तिसे क्रौंच पक्षियोंके कोलाहलसे गूँजते हुए क्रौंच पर्वतको विदीर्ण कर डाला ॥ ८४ ॥

स शालस्कन्धशबलं त्रस्तवानरवारणम् । प्रोड्डीनोद्भ्रान्तविहगं विनिष्पतितपन्नगम् ॥ ८५ ॥ गोलाङ्गूलर्क्षसंघैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् । कुरङ्गमविनिर्घोषनिनादितवनान्तरम् ॥ ८६ ॥ विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः । शोच्यामपि दशां प्राप्तो राजेव स पर्वतः ॥ ८७ ॥ क्रौंच पर्वत शालवृक्षके तनोंसे भरा हुआ था। वहाँके वानर और हाथी संत्रस्त हो उठे थे, पक्षी भयसे व्याकुल होकर उड़ चले थे, सर्प धराशायी हो गये थे, गोलांगूल जातिके वानरों

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