भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2838

इसके बाद सुरश्रेष्ठ इन्द्रने दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा—'शुभे! मैं तुम्हारी तपस्या, नियमपालन और भक्तिसे बहुत संतुष्ट हूँ। अतः कल्याणि! तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट मनोरथ है, वह पूर्ण होगा। महाभागे! तुम इस शरीरका परित्याग करके स्वर्गलोकमें मेरे पास रहोगी॥ ३०-३१॥

इदं च ते तीर्थवरं स्थिरं लोके भविष्यति। सर्वपापापहं सुभ्रु नाम्ना बदरपाचनम्॥ ३२॥ 'सुभ्रु! तुम्हारा यह श्रेष्ठ तीर्थ इस जगत्में सुस्थिर होगा, बदरपाचन नामसे प्रसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला होगा॥ ३२॥

विख्यातं त्रिषु लोकेषु ब्रह्मर्षिभिरभिप्लुतम्। अस्मिन् खलु महाभागे शुभे तीर्थवरेऽनघे॥ ३३॥ त्यक्त्वा सप्तर्षयो जग्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम्। 'यह तीनों लोकोंमें विख्यात है। बहुत-से ब्रह्मर्षियोंने इसमें स्नान किया है। पापरहित महाभागे! एक समय सप्तर्षिगण इस मंगलमय श्रेष्ठ तीर्थमें अरुन्धतीको छोड़कर हिमालय पर्वतपर गये थे॥ ३३ १/२॥

ततस्ते वै महाभागा गत्वा तत्र सुसंशिताः॥ ३४॥ वृत्त्यर्थं फलमूलानि समाहर्तुं ययुः किल। 'वहाँ पहुँचकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले वे महाभाग महर्षि जीवन-निर्वाहके निमित्त फल-मूल लानेके लिये वनमें गये॥ ३४ १/२॥

तेषां वृत्त्यर्थिनां तत्र वसतां हिमवद्वने॥ ३५॥ अनावृष्टिरनुप्राप्ता तदा द्वादशवार्षिकी। 'जीविकाकी इच्छासे जब वे हिमालयके वनमें निवास करते थे, उन्हीं दिनों बारह वर्षोंतक इस देशमें वर्षा ही नहीं हुई॥ ३५ १/२॥

ते कृत्वा चाश्रमं तत्र न्यवसन्त तपस्विनः॥ ३६॥ अरुन्धत्यपि कल्याणी तपोनित्याभवत् तदा। 'वे तपस्वी मुनि वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय कल्याणी अरुन्धती भी प्रतिदिन तपस्यामें ही लगी रही॥ ३६ १/२॥

अरुन्धतीं ततो दृष्ट्वा तीव्रं नियममास्थिताम्॥ ३७॥ अथागमत् त्रिनयनः सुप्रीतो वरदस्तदा। 'अरुन्धतीको कठोर नियमका आश्रय लेकर तपस्या करती देख त्रिनेत्रधारी वरदायक भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए॥ ३७ १/२॥

ब्राह्मं रूपं ततः कृत्वा महादेवो महायशाः॥ ३८॥ तामभ्येत्याब्रवीद् देवो भिक्षामिच्छाम्यहं शुभे।