भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2839

'फिर वे महायशस्वी महादेवजी ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास गये और बोले—'शुभे! मैं भिक्षा चाहता हूँ' ।। ३८ १/२ ।।
प्रत्युवाच ततः सा तं ब्राह्मणं चारुदर्शना ।। ३९ ।।
क्षीणोऽन्नसंचयो विप्र बदराणीह भक्षय ।
'तब परम सुन्दरी अरुन्धतीने उन ब्राह्मण देवतासे कहा—'विप्रवर! अन्नका संग्रह तो समाप्त हो गया। अब यहाँ ये बेर हैं, इन्हींको खाइये' ।। ३९ १/२ ।।
ततोऽब्रवीन्महादेवः पचस्वैतानि सुव्रते ।। ४० ।।
इत्युक्ता सापचत् तानि ब्राह्मणप्रियकाम्यया ।
अधिश्रित्य समिद्धेऽग्नौ बदराणि यशस्विनी ।। ४१ ।।
'तब महादेवजीने कहा—'सुव्रते! इन बेरोंको पका दो।' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर यशस्विनी अरुन्धतीने ब्राह्मणका प्रिय करनेकी इच्छासे उन बेरोंको प्रज्वलित अग्निपर रखकर पकाना आरम्भ किया ।। ४०-४१ ।।
दिव्या मनोरमाः पुण्याः कथाः शुश्राव सा तदा ।
अतीता सा त्वनावृष्टिर्घोरा द्वादशवार्षिकी ।। ४२ ।।
अनश्नन्त्याः पचन्त्याश्च शृण्वन्त्याश्च कथाः शुभाः ।
दिनोपमः स तस्याथ कालोऽतीतः सुदारुणः ।। ४३ ।।
'उस समय उसे परम पवित्र मनोहर एवं दिव्य कथाएँ सुनायी देने लगीं। वह बिना खाये ही बेर पकाती और मंगलमयी कथाएँ सुनती रही। इतनेमें ही बारह वर्षोंकी वह भयंकर अनावृष्टि समाप्त हो गयी। वह अत्यन्त दारुण समय उसके लिये एक दिनके समान व्यतीत हो गया ।। ४२-४३ ।।
ततस्तु मुनयः प्राप्ताः फलान्यादाय पर्वतात् ।
ततः स भगवान् प्रीतः प्रोवाचारुन्धतीं ततः ।। ४४ ।।
उपसर्पस्व धर्मज्ञे यथापूर्वमिमानृषीन् ।
प्रीतोऽस्मि तव धर्मज्ञे तपसा नियमेन च ।। ४५ ।।
'तदनन्तर सप्तर्षिगण हिमालय पर्वतसे फल लेकर वहाँ आये। उस समय भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर अरुन्धतीसे कहा—'धर्मज्ञे! अब तुम पहलेके समान इन ऋषियोंके पास जाओ! धर्मको जाननेवाली देवि! मैं तुम्हारी तपस्या और नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ ।। ४४-४५ ।।
ततः संदर्शयामास स्वरूपं भगवान् हरः ।
ततोऽब्रवीत् तदा तेभ्यस्तस्याश्च चरितं महत् ।। ४६ ।।
'ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अपने स्वरूपका दर्शन कराया और उन सप्तर्षियोंसे अरुन्धतीके महान् चरित्रका वर्णन किया ।। ४६ ।।
भवद्भिर्हिमवत्पृष्ठे यत् तपः समुपार्जितम् ।