महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2845, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयजद् वाजपेयेन सोऽश्वमेधशतेन च । प्रददौ दक्षिणां चैव पृथिवीं वै ससागराम् ॥ ९ ॥ जहाँ महातपस्वी भृगुवंशी महाभाग परशुरामजीने बारंबार क्षत्रियनरेशोंका संहार करके इस पृथिवीको जीतनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ कश्यपको आचार्यरूपसे आगे रखकर वाजपेय तथा एक सौ अश्वमेध-यज्ञद्वारा भगवान्का पूजन किया और दक्षिणारूपमें समुद्रोंसहित यह सारी पृथिवी दे दी ॥ ७—९ ॥
दत्त्वा च दानं विविधं नानारत्नसमन्वितम् । सगोहस्तिकदासीकं साजावि गतवान् वनम् ॥ १० ॥ नाना प्रकारके रत्न, गौ, हाथी, दास, दासी और भेड़-बकरोंसहित अनेक प्रकारके दान देकर वे वनमें चले गये ॥ १० ॥
पुण्ये तीर्थवरे तत्र देवब्रह्मर्षिसेविते । मुनींश्चैवाभिवाद्याथ यमुनातीर्थमागमत् ॥ ११ ॥ यत्रानयामास तदा राजसूयं महीपते । पुत्रोऽदितेर्महाभागो वरुणो वै सितप्रभः ॥ १२ ॥ पृथिवीनाथ! देवताओं और ब्रह्मर्षियोंसे सेवित उस उत्तम पुण्यमय तीर्थमें मुनियोंको प्रणाम करके बलरामजी यमुनातीर्थमें आये, जहाँ अदितिके महाभाग पुत्र गौरकान्ति वरुणजीने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था ॥ ११-१२ ॥
तत्र निर्जित्य संग्रामे मानुषान् देवतास्तथा । वरं क्रतुं समाजह्रे वरुणः परवीरहा ॥ १३ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वरुणने संग्राममें मनुष्यों और देवताओंको जीतकर उस श्रेष्ठ यज्ञका आयोजन किया था ॥ १३ ॥
तस्मिन् क्रतुवरे वृत्ते संग्रामः समजायत । देवानां दानवानां च त्रैलोक्यस्य भयावहः ॥ १४ ॥ राजन्! वह श्रेष्ठ यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और दानवोंमें घोर संग्राम हुआ था, जो तीनों लोकोंके लिये भयंकर था ॥ १४ ॥
राजसूये क्रतुश्रेष्ठे निवृत्ते जनमेजय । जायते सुमहाघोरः संग्रामः क्षत्रियान् प्रति ॥ १५ ॥ जनमेजय! क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान पूर्ण हो जानेपर उस देशके क्षत्रियोंमें महाभयंकर संग्राम हुआ करता है ॥ १५ ॥
तत्रापि लाङ्गली देव ऋषीनभ्यर्च्य पूजया । इतरेभ्योऽप्यदाद् दानमर्थिभ्यः कामदो विभुः ॥ १६ ॥ सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् हलधरने उस तीर्थमें भी स्नान एवं ऋषियोंका पूजन करके अन्य याचकोंको भी धन दान किया ॥ १६ ॥