भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2846

वनमाली ततो हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः । तस्मादादित्यतीर्थं च जगाम कमलेक्षणः ॥ १७ ॥

तदनन्तर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनकर प्रसन्न हुए वनमालाधारी कमलनयन बलराम वहाँसे आदित्यतीर्थमें गये ॥ १७ ॥

यत्रेष्ट्वा भगवान् ज्योतिर्भास्करो राजसत्तम । ज्योतिषामाधिपत्यं च प्रभावं चाभ्यपद्यत ॥ १८ ॥

नृपश्रेष्ठ! वहीं यज्ञ करके ज्योतिर्मय भगवान् भास्करने ज्योतियोंका आधिपत्य एवं प्रभुत्व प्राप्त किया था ॥ १८ ॥

तस्या नद्यास्तु तीरे वै सर्वे देवाः सवासवाः । विश्वेदेवाः समरुतो गन्धर्वाप्सरसश्च ह ॥ १९ ॥ द्वैपायनः शुकश्चैव कृष्णश्च मधुसूदनः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशाम्पते ॥ २० ॥ एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः ।

प्रजानाथ! उसी नदीके तटपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता, विश्वेदेव, मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएँ, द्वैपायन व्यास, शुकदेव, मधुसूदन श्रीकृष्ण, यक्ष, राक्षस एवं पिशाच—ये तथा और भी बहुत-से पुरुष सहस्रोंकी संख्यामें योगसिद्ध हो गये हैं ॥ १९-२० १/२ ॥

तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये परंतप ॥ २१ ॥ तत्र हत्वा पुरा विष्णुरसुरौ मधुकैटभौ । आप्लुत्य भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उत्तमे ॥ २२ ॥ द्वैपायनश्च धर्मात्मा तत्रैवाप्लुत्य भारत । सम्प्राप्य परमं योगं सिद्धिं च परमां गतः ॥ २३ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतश्रेष्ठ! सरस्वतीके उस परम उत्तम कल्याणकारी पुण्यतीर्थमें पहले मधु और कैटभ नामक असुरोंका वध करके भगवान् विष्णुने स्नान किया था। भारत! इसी प्रकार धर्मात्मा द्वैपायन व्यासने भी उसी तीर्थमें गोता लगाया था। इससे उन्होंने परम योगको पाकर उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥

असितो देवलश्चैव तस्मिन्नेव महातपाः । परमं योगमास्थाय ऋषियोगमवाप्तवान् ॥ २४ ॥

महातपस्वी असित देवल ऋषिने उसी तीर्थमें परम योगका आश्रय ले योगसिद्धि पायी थी ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥