महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2850, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंगच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां पतिम् ॥ १५ ॥
जैगीषव्यं ततोऽपश्यद् गतं प्रागेव भारत ।
भारत! नदीपति समुद्रके पास पहुँचते ही धर्मात्मा देवलने देखा कि जैगीषव्य वहाँ पहलेसे ही गये हैं ॥
ततः सविस्मयश्चिन्तां जगामाथामितप्रभः ॥ १६ ॥
कथं भिक्षुरयं प्राप्तः समुद्रे स्नात एव च ।
इत्येवं चिन्तयामास महर्षिरसितस्तदा ॥ १७ ॥
तब तो अमित तेजस्वी महर्षि असित देवलको चिन्ताके साथ-साथ आश्चर्य भी हुआ। वे सोचने लगे, ‘ये भिक्षु यहाँ पहले ही कैसे आ पहुँचे? इन्होंने तो समुद्रमें स्नानका कार्य भी पूर्ण कर लिया’ ॥ १६-१७ ॥
स्नात्वा समुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप सः ।
कृतजप्याह्निकः श्रीमाना श्रमं च जगाम ह ॥ १८ ॥
कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय ।
जनमेजय! फिर उन्होंने समुद्रमें विधिपूर्वक स्नान करके पवित्र हो जपनेयोग्य मन्त्रका जप किया। जप आदि नित्यकर्म पूर्ण करके श्रीमान् देवल जलसे भरा हुआ कलश लेकर अपने आश्रमपर आये ॥ १८½ ॥
ततः स प्रविशन्नेव स्वमाश्रमपदं मुनिः ॥ १९ ॥
आसीनमाश्रमे तत्र जैगीषव्यमपश्यत ।
न व्याहरति चैवेनं जैगीषव्यः कथंचन ॥ २० ॥
काष्ठभूतोऽश्रमपदे वसति स्म महातपाः ।
आश्रममें प्रवेश करते ही देवलमुनिने वहाँ बैठे हुए जैगीषव्यको देखा, परंतु जैगीषव्यने उस समय भी किसी तरह उनसे बात नहीं की। वे महातपस्वी मुनि आश्रमपर काष्ठमौन होकर बैठे हुए थे ॥ १९-२०½ ॥
तं दृष्ट्वा चाप्लुतं तोये सागरे सागरोपमम् ॥ २१ ॥
प्रविष्टमाश्रमं चापि पूर्वमेव ददर्श सः ।
असितो देवलो राजंश्चिन्तयामास बुद्धिमान् ॥ २२ ॥
राजन्! समुद्रके समान अत्यन्त प्रभावशाली मुनिको समुद्रके जलमें स्नान करके अपनेसे पहले ही आश्रममें प्रविष्ट हुआ देख बुद्धिमान् असित देवलको पुनः बड़ी चिन्ता हुई ॥ २१-२२ ॥
दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ।
चिन्तयामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः ॥ २३ ॥
मया दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथं त्वयम् ।