महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2851, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर ये मुनिश्रेष्ठ देवल फिर सोचने लगे—'मैंने इन्हें अभी-अभी समुद्रतटपर देखा है, फिर ये आश्रममें कैसे उपस्थित हैं?' ॥ २३ १/२ ॥ एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः ॥ २४ ॥ उत्पपाताश्रमात् तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते । जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ॥ २५ ॥ प्रजानाथ! ऐसा विचार करते हुए वे मन्त्रशास्त्रके पारंगत विद्वान् मुनि उस आश्रमसे आकाशकी ओर उड़ चले। उस समय भिक्षु जैगीषव्यकी परीक्षा लेनेके लिये उन्होंने ऐसा किया ॥ २४-२५ ॥ सोऽन्तरिक्षचरान् सिद्धान् समपश्यत् समाहितान् । जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ॥ २६ ॥ ऊपर जाकर उन्होंने बहुत-से अन्तरिक्षचारी एकाग्रचित्तवाले सिद्धोंको देखा। साथ ही उन सिद्धोंके द्वारा पूजे जाते हुए जैगीषव्य मुनिका भी उन्हें दर्शन हुआ ॥ ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः । अपश्यद् वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ॥ २७ ॥ तदनन्तर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले दृढ़निश्चयी असित देवल मुनि रोषावेशमें भर गये। फिर उन्होंने जैगीषव्यको स्वर्गलोकमें जाते देखा ॥ २७ ॥ तस्मात् तु पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत । पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ॥ २८ ॥ स्वर्गलोकसे उन्हें पितृलोकमें और पितृलोकसे यमलोकमें जाते देखा ॥ २८ ॥ तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिप्लुतम् । व्रजन्तमन्वपश्यत् स जैगीषव्यं महामुनिम् ॥ २९ ॥ वहाँसे भी ऊपर उठकर महामुनि जैगीषव्य जलमय चन्द्रलोकमें जाते दिखायी दिये ॥ २९ ॥ लोकान् समुत्पतन्तं तु शुभानेकान्तयाजिनाम् । ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्ततश्चाप्युत्पपात ह ॥ ३० ॥ फिर वे एकान्ततः यज्ञ करनेवाले पुरुषोंके उत्तम लोकोंकी ओर उड़ते दिखायी दिये। वहाँसे वे अग्निहोत्रियोंके लोकोंमें गये ॥ ३० ॥ दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः । तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुयाजिनाम् ॥ ३१ ॥ उन लोकोंसे ऊपर उठकर वे बुद्धिमान् मुनि उन तपोधनोंके लोकमें गये, जो दर्श और पौर्णमास यज्ञ करते हैं। वहाँसे वे पशुयाग करनेवालोंके लोकोंमें जाते दिखायी दिये ॥ ३१ ॥