महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 289, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमायान्तमभिक्रुद्धं द्रोणं दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । बहुधा चिन्तयामास द्रोणस्य प्रतिवारणम् ॥ ११ ॥ क्रोधमें भरे हुए उन्हीं द्रोणाचार्यको आते देख राजा युधिष्ठिरने उन्हें रोकनेके उपायपर बारंबार विचार किया ॥ ११ ॥ अशक्यं तु तमन्येन द्रोणं मत्वा युधिष्ठिरः । अविषह्यं गुरुं भारं सौभद्रं समवासृजत् ॥ १२ ॥ इस समय द्रोणाचार्यका सामना करना दूसरेके लिये असम्भव जानकर युधिष्ठिरने वह दुःसह एवं महान् भार सुभद्राकुमार अभिमन्युपर रख दिया ॥ १२ ॥ वासुदेवादवरं फाल्गुनाच्चामितौजसम् । अब्रवीत् परवीरघ्नमभिमन्युमिदं वचः ॥ १३ ॥ अमिततेजस्वी अभिमन्यु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे किसी बातमें कम नहीं था, वह शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ था; अतः उससे युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा — ॥ १३ ॥ एत्य नो नार्जुनो गर्हेद् यथा तात तथा कुरु । चक्रव्यूहस्य न वयं विद्मो भेदं कथंचन ॥ १४ ॥ ‘तात संशप्तकोंके साथ युद्ध करके लौटनेपर अर्जुन जिस प्रकार हमलोगोंकी निन्दा न करें (हमें असमर्थ न बतावें), वैसा कार्य करो। हमलोग तो किसी तरह भी चक्रव्यूहके भेदनकी प्रक्रियाको नहीं जानते हैं ॥ त्वं वार्जुनो वा कृष्णो वा भिन्द्यात् प्रद्युम्न एव वा । चक्रव्यूहं महाबाहो पञ्चमो नोपपद्यते ॥ १५ ॥ ‘महाबाहो! तुम, अर्जुन, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न—ये चार पुरुष ही चक्रव्यूहका भेदन कर सकते हो। पाँचवाँ कोई योद्धा इस कार्यके योग्य नहीं है ॥ १५ ॥ अभिमन्यो वरं तात याचतां दातुमर्हसि । पितॄणां मातुलानां च सैन्यानां चैव सर्वशः ॥ १६ ॥ ‘तात अभिमन्यु! तुम्हारे पिता और मामाके पक्षके समस्त योद्धा तथा सम्पूर्ण सैनिक तुमसे याचना कर रहे हैं। तुम्हीं इन्हें वर देनेके योग्य हो ॥ १६ ॥ धनंजयो हि नस्तात गर्हयेदेत्य संयुगात् । क्षिप्रमस्त्रं समादाय द्रोणानीकं विशातय ॥ १७ ॥ ‘तात! यदि हम विजयी नहीं हुए तो युद्धसे लौटनेपर अर्जुन निश्चय ही हमलोगोंको कोसेंगे, अतः शीघ्र अस्त्र लेकर तुम द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश कर डालो’ ॥ १७ ॥ अभिमन्युरुवाच द्रोणस्य दृढमत्युग्रमनीकप्रवरं युधि ।