भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 290

पितॄणां जयमाकाङ्क्षन्नवगाहेऽविलम्बितम् ॥ १८ ॥

अभिमन्युने कहा—महाराज! मैं अपने पितृ-वर्गकी विजयकी अभिलाषासे युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यकी अत्यन्त भयंकर, सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सेनामें शीघ्र ही प्रवेश करता हूँ ॥ १८ ॥
उपदिष्टो हि मे पित्रा योगोऽनीकविशातने ।
नोत्सहे हि विनिर्गन्तुमहं कस्यांचिदापदि ॥ १९ ॥
पिताजीने मुझे चक्रव्यूहको भेदनकी विधि तो बतायी है; परंतु किसी आपत्तिमें पड़ जानेपर मैं उस व्यूहसे बाहर नहीं निकल सकता ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भिन्ध्यनीकं युधां श्रेष्ठ द्वारं संजनयस्व नः ।
वयं त्वानुगमिष्यामो येन त्वं तात यास्यसि ॥ २० ॥
युधिष्ठिर बोले—योद्धाओंमें श्रेष्ठ वीर! तुम व्यूहका भेदन करो और हमारे लिये द्वार बना दो! तात! फिर तुम जिस मार्गसे जाओगे, उसीके द्वारा हम भी तुम्हारे पीछे-पीछे चले चलेंगे ॥ २० ॥
धनंजयसमं युद्धे त्वां वयं तात संयुगे ।
प्रणिधायानुयास्यामो रक्षन्तः सर्वतोमुखाः ॥ २१ ॥
बेटा! हमलोग युद्धस्थलमें तुम्हें अर्जुनके समान मानते हैं। हम अपना ध्यान तुम्हारी ही ओर रखकर सब ओरसे तुम्हारी रक्षा करते हुए तुम्हारे साथ ही चलेंगे ॥ २१ ॥

भीम उवाच