भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 291

अहं त्वानुगमिष्यामि धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः । पञ्चालाः केकया मत्स्यास्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ॥ २२ ॥ भीमसेन बोले— बेटा! मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। धृष्टद्युम्न, सात्यकि, पांचालदेशीय योद्धा, केकय-राजकुमार, मत्स्य देशके सैनिक तथा समस्त प्रभद्रकगण भी तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥ २२ ॥

सकृद् भिन्नं त्वया व्यूहं तत्र तत्र पुनः पुनः । वयं प्रध्वंसयिष्यामो निघ्नमाना वरान् वरान् ॥ २३ ॥ तुम जहाँ-जहाँ एक बार भी व्यूह तोड़ दोगे, वहाँ-वहाँ हमलोग मुख्य-मुख्य योद्धाओंका वध करके उस व्यूहको बारंबार नष्ट करते रहेंगे ॥ २३ ॥

अभिमन्युरुवाच

अहमेतत् प्रवेक्ष्यामि द्रोणानीकं दुरासदम् । पतङ्ग इव संक्रुद्धो ज्वलितं जातवेदसम् ॥ २४ ॥ अभिमन्युने कहा— जैसे पतंग जलती हुई आगमें कूद पड़ता है, उसी प्रकार मैं भी कुपित हो द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्य-व्यूहमें प्रवेश करूँगा ॥ २४ ॥

तत् कर्माद्य करिष्यामि हितं यद् वंशयोर्द्वयोः । मातुलस्य च यत् प्रीतिं करिष्यति पितुश्च मे ॥ २५ ॥ आज मैं वह पराक्रम करूँगा, जो पिता और माता दोनोंके कुलोंके लिये हितकर होगा तथा वह मामा श्रीकृष्ण तथा पिता अर्जुन दोनोंको प्रसन्न करेगा ॥ २५ ॥

शिशुनैकेन संग्रामे काल्यमानानि संघशः । द्रक्ष्यन्ति सर्वभूतानि द्विषत्सैन्यानि वै मया ॥ २६ ॥ यद्यपि मैं अभी बालक हूँ तो भी आज समस्त प्राणी देखेंगे कि मैंने अकेले ही समूह-के-समूह शत्रुसैनिकोंका युद्धमें संहार कर डाला है ॥ २६ ॥

नाहं पार्थेन जातः स्यां न च जातः सुभद्रया । यदि मे संयुगे कश्चिज्जीवितो नाद्य मुच्यते ॥ २७ ॥ यदि आज मेरे साथ युद्ध करके कोई भी सैनिक जीवित बच जाय तो मैं अर्जुनका पुत्र नहीं और सुभद्राकी कोखसे मेरा जन्म नहीं ॥ २७ ॥

यदि चैकरथेनाहं समग्रं क्षत्रमण्डलम् । न करोम्यष्टधा युद्धे न भवाम्यर्जुनात्मजः ॥ २८ ॥ यदि मैं युद्धमें एकमात्र रथकी सहायतासे सम्पूर्ण क्षत्रियमण्डलके आठ टुकड़े न कर दूँ तो अर्जुनका पुत्र नहीं ॥

युधिष्ठिर उवाच

एवं ते भाषमाणस्य बलं सौभद्र वर्धताम् ।