महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 292, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् समुत्सहसे भेत्तुं द्रोणानीकं दुरासदम् ॥ २९ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सुभद्रानन्दन! ऐसी ओजस्वी बातें कहते हुए तुम्हारा बल निरन्तर बढ़ता रहे; क्योंकि तुम द्रोणाचार्यके दुर्गम सैन्यमें प्रवेश करनेका उत्साह रखते हो ॥ २९ ॥
रक्षितं पुरुषव्याघ्रैर्महेष्वासैर्महाबलैः ।
साध्यरुद्रमरुत्तुल्यैर्वस्वग्न्यादित्यविक्रमैः ॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यकी सेना उन महाबली महाधनुर्धर पुरुषसिंह वीरों द्वारा सुरक्षित है, जो कि साध्य, रुद्र तथा मरुद्गणोंके समान बलवान् और वसु, अग्नि एवं सूर्यके समान पराक्रमी हैं ॥ ३० ॥
संजय उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा स यन्तारमचोदयत् ।
सुमित्राश्वांन् रणे क्षिप्रं द्रोणानीकाय चोदय ॥ ३१ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर अभिमन्युने अपने सारथिको यह आज्ञा दी—‘सुमित्र! तुम शीघ्र ही घोड़ोंको रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर हाँक ले चलो ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि अभिमन्युप्रतिज्ञायां पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें अभिमन्युकी प्रतिज्ञाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥