महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2890, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरेश्वर! कुओंके जल सब ओरसे अपने-आप बढ़ने लगे और बिना शरीरके ही जोर-जोरसे गर्जनाएँ सुनायी दे रही थीं ॥ १४ ॥ एवमादीनि दृष्ट्वाथ निमित्तानि वृकोदरः । उवाच भ्रातरं ज्येष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ १५ ॥ इस प्रकार बहुत-से अपशकुन देखकर भीमसेन अपने ज्येष्ठ भ्राता धर्मराज युधिष्ठिरसे बोले— ॥ १५ ॥ नैष शक्तो रणे जेतुं मन्दात्मा मां सुयोधनः । अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निगूढं हृदये चिरम् ॥ १६ ॥ सुयोधने कौरवेन्द्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः । शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् ॥ १७ ॥ ‘भैया! यह मन्दबुद्धि दुर्योधन रणभूमिमें मुझे किसी प्रकार परास्त नहीं कर सकता। आज मैं अपने हृदयमें चिरकालसे छिपाये हुए क्रोधको कौरवराज दुर्योधनपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे अर्जुनने खाण्डववनमें अग्निको छोड़ा था। पाण्डुनन्दन! आज आपके हृदयका काँटा मैं निकाल दूँगा ॥ १६-१७ ॥ निहत्य गदया पापमिमं कुरुकुलाधमम् । अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्याम्यहं त्वयि ॥ १८ ॥ ‘मैं अपनी गदासे इस कुरुकुलाधम पापीको मारकर आज आपको कीर्तिमयी माला पहनाऊँगा ॥ १८ ॥ हत्वेमं पापकर्माणं गदया रणमूर्धनि । अद्यास्य शतधा देहं भिनद्मि गदयानया ॥ १९ ॥ ‘युद्धके मुहानेपर गदाके आघातसे इस पापीका वध करके आज इसी गदासे इसके शरीरके सौ-सौ टुकड़े कर डालूँगा ॥ १९ ॥ नायं प्रवेष्टा नगरं पुनर्वारणसाह्वयम् । सर्पोत्सर्गस्य शयने विषदानस्य भोजने ॥ २० ॥ प्रमाणकोट्यां पातस्य दाहस्य जतुवेश्मनि । सभायामवहासस्य सर्वस्वहरणस्य च ॥ २१ ॥ वर्षमज्ञातवासस्य वनवासस्य चानघ । अद्यान्तमेषां दुःखानां गन्ताहं भरतर्षभ ॥ २२ ॥ ‘अब फिर कभी यह हस्तिनापुरमें प्रवेश नहीं करेगा। भरतश्रेष्ठ! इसने जो मेरी शय्यापर साँप छोड़ा था, भोजनमें विष दिया था, प्रमाणकोटिके जलमें मुझे गिराया था, लाक्षागृहमें जलानेकी चेष्टा की थी, भरी सभामें मेरा उपहास किया था, सर्वस्व हर लिया था तथा बारह वर्षोंतक वनवास और एक वर्षतक अज्ञातवासके लिये विवश किया था; इसके द्वारा प्राप्त हुए मैं इन सभी दुःखोंका अन्त कर डालूँगा ॥ २०—२२ ॥