महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2891, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकाह्ना विनिहत्येमं भविष्याम्यात्मनोऽनृणः ।
अद्यायुर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेरकृतात्मनः ।। २३ ।।
समाप्तं भरतश्रेष्ठ मातापित्रोश्च दर्शनम् ।
‘आज एक दिनमें इसका वध करके मैं अपने-आपसे उऋण हो जाऊँगा। भरतभूषण! आज दुर्बुद्धि एवं अजितात्मा धृतराष्ट्रपुत्रकी आयु समाप्त हो गयी है। इसे माता-पिताके दर्शनका अवसर भी अब नहीं मिलनेवाला है ।। २३ १/२ ।।
अद्य सौख्यं तु राजेन्द्र कुरुराजस्य दुर्मतेः ।। २४ ।।
समाप्तं च महाराज नारीणां दर्शनं पुनः ।
‘राजेन्द्र! महाराज! आज खोटी बुद्धिवाले कुरुराज दुर्योधनका सारा सुख समाप्त हो गया। अब इसके लिये पुनः अपनी स्त्रियोंको देखना और उनसे मिलना असम्भव है ।। २४ १/२ ।।
अद्यायं कुरुराजस्य शान्तनोः कुलपांसनः ।। २५ ।।
प्राणान् श्रियं च राज्यं च त्यक्त्वा शेष्यति भूतले ।
‘कुरुराज शान्तनुके कुलका यह जीता-जागता कलंक आज अपने प्राण, लक्ष्मी तथा राज्यको छोड़कर सदाके लिये पृथ्वीपर सो जायगा ।। २५ १/२ ।।
राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं निपातितम् ।। २६ ।।
स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत्तच्छकुनिबुद्धिजम् ।
‘आज राजा धृतराष्ट्र अपने इस पुत्रको मारा गया सुनकर अपने उन अशुभ कर्मोंको याद करेंगे, जिन्हें उन्होंने शकुनिकी सलाहके अनुसार किया था’ ।। २६ १/२ ।।
इत्युक्त्वा राजशार्दूल गदामादाय वीर्यवान् ।। २७ ।।
अभ्यतिष्ठत युद्धाय शक्रो वृत्रमिवाह्वयन् ।
नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर पराक्रमी भीमसेन हाथमें गदा ले युद्धके लिये खड़े हो गये और जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको ललकारा था, उसी प्रकार वे दुर्योधनका आह्वान करने लगे ।। २७ १/२ ।।
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् ।। २८ ।।
भीमसेनः पुनः क्रुद्धो दुर्योधनमुवाच ह ।
शिखरयुक्त कैलास पर्वतके समान गदा उठाये दुर्योधनको खड़ा देख भीमसेन पुनः कुपित हो उससे इस प्रकार बोले— ।। २८ १/२ ।।
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य तथा त्वमपि चात्मनः ।। २९ ।।
स्मर तद् दुष्कृतं कर्म यद् वृत्तं वारणावते ।
‘दुर्योधन! वारणावत नगरमें जो कुछ हुआ था, राजा धृतराष्ट्रके और अपने भी उस कुकर्मको तू याद कर ले ।। २९ १/२ ।।