भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2928, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2928

तवाद्य पृथिवी सर्वा क्षेमा निहतकण्टका । तां प्रशाधि महाराज स्वधर्ममनुपालय ॥ ४३ ॥ ‘महाराज! आज यह सारी पृथिवी आपकी हो गयी, इसके काँटे नष्ट कर दिये गये, अतः यह मंगलमयी हो गयी है। आप इसका शासन तथा अपने धर्मका पालन कीजिये ॥ ४३ ॥ यस्तु कर्तास्य वैरस्य निकृत्या निकृतिप्रियः । सोऽयं विनिहतः शेते पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ४४ ॥ ‘पृथिवीनाथ! जिसे छल और कपट ही प्रिय था तथा जिसने कपटसे ही इस वैरकी नींव डाली थी, वही यह दुर्योधन आज मारा जाकर पृथ्वीपर सो रहा है ॥ दुःशासनप्रभृतयः सर्वे ते चोग्रवादिनः । राधेयः शकुनिश्चैव हताश्च तव शत्रवः ॥ ४५ ॥ ‘वे भयंकर कटुवचन बोलनेवाले दुःशासन आदि धृतराष्ट्रपुत्र तथा कर्ण और शकुनि आदि आपके सभी शत्रु मार डाले गये ॥ ४५ ॥ सेयं रत्नसमाकीर्णा मही सवनपर्वता । उपावृत्ता महाराज त्वामद्य निहतद्विषम् ॥ ४६ ॥ ‘महाराज! आपके शत्रु नष्ट हो गये। आज यह रत्नोंसे भरी हुई वन और पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी आपकी सेवामें प्रस्तुत है’ ॥ ४६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

गतो वैरस्य निधनं हतो राजा सुयोधनः । कृष्णस्य मतमास्थाय विजितेयं वसुन्धरा ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर बोले— भीमसेन! सौभाग्यकी बात है कि तुमने वैरका अन्त कर दिया, राजा दुर्योधन मारा गया और श्रीकृष्णके मतका आश्रय लेकर हमने यह सारी पृथ्वी जीत ली ॥ ४७ ॥ दिष्ट्या गतस्त्वमानृण्यं मातुः कोपस्य चोभयोः । दिष्ट्या जयति दुर्धर्ष दिष्ट्या शत्रुनिपातितः ॥ ४८ ॥ सौभाग्यसे तुम माता तथा क्रोध दोनोंके ऋणसे उऋण हो गये। दुर्धर्ष वीर! भाग्यवश तुम विजयी हुए और सौभाग्यसे ही तुमने अपने शत्रुको मार गिराया ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवसान्त्वने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें श्रीकृष्णका बलदेवजीको सान्त्वना देनाविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५६ १/३ श्लोक हैं।)