भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2931

तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत ॥ १५ ॥ ‘भारत! निश्चय ही वृत्रासुरके मारे जानेपर वन्दीजनोंने जिस प्रकार इन्द्रका अभिनन्दन किया था, उसी प्रकार हम शत्रुओंका वध करनेवाले आपका अभिनन्दन करते हैं ॥ १५ ॥

दुर्योधनवधे यानि रोमाणि हृषितानि नः । अद्यापि न विकृष्यन्ते तानि तद् विद्धि भारत ॥ १६ ॥ ‘भरतनन्दन! दुर्योधनके वधके समय हमारे शरीरमें जो रोंगटे खड़े हुए थे, वे अब भी ज्यों-के-त्यों हैं, गिर नहीं रहे हैं। इन्हें आप देख लें’ ॥ १६ ॥

इत्यब्रुवन् भीमसेनं वातिकास्तत्र सङ्गताः । तान् हृष्टान् पुरुषव्याघ्रान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ॥ १७ ॥ ब्रुवतोऽसदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदनः । प्रशंसा करनेवाले वीरगण वहाँ एकत्र होकर भीमसेनसे उपर्युक्त बातें कह रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि पुरुषसिंह पांचाल और पाण्डव अयोग्य बातें कह रहे हैं, तब वे वहाँ उन सबसे बोले— ॥

न न्याय्यं निहतं शत्रुं भूयो हन्तुं नराधिपाः ॥ १८ ॥ असकृद् वाग्भिरुग्राभिर्निहतो ह्येष मन्दधीः । ‘नरेश्वरो! मरे हुए शत्रुको पुनः मारना उचित नहीं है। तुमलोगोंने इस मन्दबुद्धि दुर्योधनको बारंबार कठोर वचनोंद्वारा घायल किया है ॥ १८ १/२ ॥

तदैवैष हतः पापो यदैव निरपत्रपः ॥ १९ ॥ लुब्धः पापसहायश्च सुहृदां शासनातिगः । ‘यह निर्लज्ज पापी तो उसी समय मर चुका था जब लोभमें फँसा और पापियोंको अपना सहायक बनाकर सुहृदोंके शासनसे दूर रहने लगा ॥ १९ १/२ ॥

बहुशो विदुरद्रोणकृपगाङ्गेयसञ्जयैः ॥ २० ॥ पाण्डुभ्यः प्रार्थ्यमानोऽपि पित्र्यमंशं न दत्तवान् । ‘विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म तथा संजयोंके बारंबार प्रार्थना करनेपर भी इसने पाण्डवोंको उनका पैतृक भाग नहीं दिया ॥ २० १/२ ॥

नैष योग्योऽद्य मित्रं वा शत्रुुर्वा पुरुषाधमः ॥ २१ ॥ किमनेनातिभुग्नेन वाग्भिः काष्ठसधर्मणा । रथेष्वारोहत क्षिप्रं गच्छामो वसुधाधिपाः ॥ २२ ॥ दिष्ट्या हतोऽयं पापात्मा सामात्यज्ञातिबान्धवः । ‘यह नराधम अब किसी योग्य नहीं है। न यह किसीका मित्र है और न शत्रु। राजाओ! यह तो सूखे काठके समान कठोर है। इसे कटुवचनोंद्वारा अधिक झुकानेकी चेष्टा करनेसे क्या लाभ? अब शीघ्र अपने रथोंपर बैठो। हम सब लोग छावनीकी ओर चलें। सौभाग्यसे यह पापात्मा अपने मन्त्री, कुटुम्ब और भाई-बन्धुओंसहित मार डाला गया’ ॥ २१-२२ १/२ ॥