भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2932

इति श्रुत्वा त्वधिक्षेपं कृष्णाद् दुर्योधनो नृपः ॥ २३ ॥
अमर्षवशमापन्न उदतिष्ठद् विशाम्पते ।
स्फिग्देशेनोपविष्टः स दोर्भ्यां विष्टभ्य मेदिनीम् ॥ २४ ॥
प्रजानाथ! श्रीकृष्णके मुखसे यह आक्षेपयुक्त वचन सुन राजा दुर्योधन अमर्षके वशीभूत होकर उठा और दोनों हाथ पृथ्वीपर टेककर चूतड़के सहारे बैठ गया ॥
दृष्टिं भ्रूसङ्कटां कृत्वा वासुदेवे न्यपातयत् ।
अर्धोन्नतशरीरस्य रूपमासीन्नृपस्य तु ॥ २५ ॥
क्रुद्धस्याशीविषस्येव छिन्नपुच्छस्य भारत ।
तत्पश्चात् उसने श्रीकृष्णकी ओर भौंहें टेढ़ी करके देखा, उसका आधा शरीर उठा हुआ था। उस समय राजा दुर्योधनका रूप उस कुपित विषधरके समान जान पड़ता था, जो पूँछ कट जानेके कारण अपने आधे शरीरको ही उठाकर देख रहा हो ॥ २५ १/२ ॥
प्राणान्तकरिणीं घोरां वेदनामप्यचिन्तयन् ॥ २६ ॥
दुर्योधनो वासुदेवं वाग्भिरुग्राभिरार्दयत् ।
उसे प्राणोंका अन्त कर देनेवाली भयंकर वेदना हो रही थी, तो भी उसकी चिन्ता न करते हुए दुर्योधनने अपने कठोर वचनोंद्वारा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ॥ २६ १/२ ॥
कंसदासस्य दायाद न ते लज्जास्त्यनेन वै ॥ २७ ॥
अधर्मेण गदायुद्धे यदहं विनिपातितः ।
‘ओ कंसके दासके बेटे! मैं जो गदायुद्धमें अधर्मसे मारा गया हूँ, इस कुकृत्यके कारण क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती है? ॥ २७ १/२ ॥
ऊरू भिन्धीति भीमस्य स्मृतिं मिथ्या प्रयच्छता ॥ २८ ॥
किं न विज्ञातमेतन्मे यदर्जुनमवोचथाः ।
‘भीमसेनको मेरी जाँघें तोड़ डालनेका मिथ्या स्मरण दिलाते हुए तुमने अर्जुनसे जो कुछ कहा था, क्या वह मुझे ज्ञात नहीं है? ॥ २८ १/२ ॥
घातयित्वा महीपालानृजुयुद्धान् सहस्रशः ॥ २९ ॥
जिह्यैरुपायैर्बहुभिर्न ते लज्जा न ते घृणा ।
‘सरलतासे धर्मानुकूल युद्ध करनेवाले सहस्रों भूमिपालोंको बहुत-से कुटिल उपायोंद्वारा मरवाकर न तुम्हें लज्जा आती है और न इस बुरे कर्मसे घृणा ही होती है ॥
अहन्यहनि शूराणां कुर्वाणः कदनं महत् ॥ ३० ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य घातितस्ते पितामहः ।
‘जो प्रतिदिन शूरवीरोंका भारी संहार मचा रहे थे, उन पितामह भीष्मका तुमने शिखण्डीको आगे रखकर वध कराया ॥ ३० १/२ ॥