महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2934, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'परंतु तुम-जैसे अनार्यने कुटिल मार्गका आश्रय लेकर स्वधर्म-पालनमें लगे हुए हमलोगोंका तथा दूसरे राजाओंका भी वध करवाया है' ।। ३८ १/२ ।।
वासुदेव उवाच
हतस्त्वमसि गान्धारे सभ्रातृसुतबान्धवः ।। ३९ ।।
सगणः ससुहृच्चैव पापं मार्गमनुष्ठितः ।
तवैव दुष्कृतैर्वीरो भीष्मद्रोणौ निपातितौ ।। ४० ।।
कर्णश्च निहतः संख्ये तव शीलानुवर्तकः ।
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**गान्धारीनन्दन! तुमने पापके रास्तेपर पैर रखा था; इसीलिये तुम भाई, पुत्र, बान्धव, सेवक और सुहृद्गणोंसहित मारे गये हो। वीर भीष्म और द्रोणाचार्य तुम्हारे दुष्कर्मोंसे ही मारे गये हैं। कर्ण भी तुम्हारे स्वभावका ही अनुसरण करनेवाला था; इसलिये युद्धमें मारा गया ।। ३९-४० १/२ ।।
याच्यमानं मया मूढ पित्र्यमंशं न दित्ससि ।। ४१ ।।
पाण्डवेभ्यः स्वराज्यं च लोभाच्छकुनिनिश्चयात् ।
ओ मूर्ख! तुम शकुनिकी सलाह मानकर मेरे माँगनेपर भी पाण्डवोंको उनकी पैतृक सम्पत्ति, उनका अपना राज्य लोभवश नहीं देना चाहते थे ।। ४१ १/२ ।।
विषं ते भीमसेनाय दत्तं सर्वे च पाण्डवाः ।। ४२ ।।
प्रदीपिता जतुगृहे मात्रा सह सुदुर्मते ।
सभायां याज्ञसेनी च कृष्टा द्यूते रजस्वला ।। ४३ ।।
तदैव तावद् दुष्टात्मन् वध्यस्त्वं निरपत्रप ।
सुदुर्मते! तुमने जब भीमसेनको विष दिया, समस्त पाण्डवोंको उनकी माताके साथ लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया और निर्लज्ज! दुष्टात्मन्! द्यूतक्रीड़ाके समय भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको जब तुमलोग घसीट लाये, तभी तुम वधके योग्य हो गये थे ।।
अनक्षज्ञं च धर्मज्ञं सौबलेनाक्षवेदिना ।। ४४ ।।
निकृत्या यत् पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे ।
तुमने द्यूतक्रीड़ाके जानकार सुबलपुत्र शकुनिके द्वारा उस कलाको न जाननेवाले धर्मज्ञ युधिष्ठिरको, जो छलसे पराजित किया था, उसी पापसे तुम रणभूमिमें मारे गये हो ।। ४४ १/२ ।।
जयद्रथेन पापेन यत् कृष्णा क्लेशिता वने ।। ४५ ।।
यातेषु मृगयां चैव तृणबिन्दोरथाश्रमम् ।
अभिमन्युश्च यद् बाल एको बहुभिराहवे ।। ४६ ।।
त्वद्दोषैर्निहतः पाप तस्मादसि हतो रणे ।