भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2935, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2935

जब पाण्डव शिकारके लिये तृणबिन्दुके आश्रमपर चले गये थे, उस समय पापी जयद्रथने वनके भीतर द्रौपदीको जो क्लेश पहुँचाया और पापात्मन्! तुम्हारे ही अपराधसे बहुत-से योद्धाओंने मिलकर युद्धस्थलमें जो अकेले बालक अभिमन्युका वध किया था, इन्हीं सब कारणोंसे आज तुम भी रणभूमिमें मारे गये हो ॥ ४५-४६ १/२ ॥

(कुर्वाणं कर्म समरे पाण्डवानर्थकाङ्क्षिणम् । यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्मं मित्रार्थे न व्यतिक्रमः ॥ भीष्म पाण्डवोंके अनर्थकी इच्छा रखकर समरभूमिमें पराक्रम प्रकट कर रहे थे। उस समय अपने मित्रोंके हितके लिये शिखण्डीने जो उनका वध किया है, वह कोई दोष या अपराधकी बात नहीं है।

स्वधर्मं पृष्ठतः कृत्वा आचार्यस्त्वत्प्रियेप्सया । पार्षतेन हतः संख्ये वर्तमानोऽसतां पथि ॥ आचार्य द्रोण तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे अपने धर्मको पीछे करके असाधु पुरुषोंके मार्गपर चल रहे थे; अतः युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नने उनका वध किया है।

प्रतिज्ञामात्मनः सत्यां चिकीर्षन् समरे रिपुम् । हतवान् सात्वतो विद्वान् सौमदत्तिं महारथम् ॥ विद्वान् सात्वतवंशी सात्यकिने अपनी सच्ची प्रतिज्ञाका पालन करनेकी इच्छासे समरांगणमें अपने शत्रु महारथी भूरिश्रवाका वध किया था।

अर्जुनः समरे राजन् युध्यमानः कदाचन । निन्दितं पुरुषव्याघ्रः करोति न कथंचन ॥ राजन्! समरभूमिमें युद्ध करते हुए पुरुषसिंह अर्जुन कभी किसी प्रकार भी कोई निन्दित कार्य नहीं करते हैं!

लब्ध्वापि बहुशश्छिद्रं वीरवृत्तमनुस्मरन् । न जघान रणे कर्णं मैवं वोचः सुदुर्मते ॥ दुर्मते! अर्जुनने वीरोचित सदाचारका विचार करके बहुत-से छिद्र (प्रहार करनेके अवसर) पाकर भी युद्धमें कर्णका वध नहीं किया है; अतः तुम उनके विषयमें ऐसी बात न कहो।

देवानां मतमाज्ञाय तेषां प्रियहितेप्सया । नार्जुनस्य महानागं मया व्यंसितमस्त्रजम् ॥ देवताओंका मत जानकर उनका प्रिय और हित करनेकी इच्छासे मैंने अर्जुनपर महानागास्त्रका प्रहार नहीं होने दिया। उसे विफल कर दिया।

त्वं च भीष्मश्च कर्णश्च द्रोणो द्रौणिस्तथा कृपः । विराटनगरे तस्य आनृशंस्याच्च जीविताः ॥