महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2939, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन शक्यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना ॥ ६६ ॥ 'यह गदाधारी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन भी युद्धसे थकता नहीं था, इसे दण्डधारी काल भी धर्मानुकूल युद्धके द्वारा नहीं मार सकता था ॥ ६६ ॥ न च वो हृदि कर्तव्यं यदयं घातितो रिपुः । मिथ्यावध्यास्तथोपायैर्बहवः शत्रवोऽधिकाः ॥ ६७ ॥ 'इस प्रकार जो यह शत्रु मारा गया है इसके लिये तुम्हें अपने मनमें विचार नहीं करना चाहिये? बहुतेरे अधिक शक्तिशाली शत्रु नाना प्रकारके उपायों और कूटनीतिके प्रयोगोंद्वारा मारनेके योग्य होते हैं ॥ ६७ ॥ पूर्वै्रनुगतो मार्गो दैवैरसुरघातिभिः । सद्भिश्चानुगतः पन्थाः स सर्वैरनुगम्यते ॥ ६८ ॥ 'असुरोंका विनाश करनेवाले पूर्ववर्ती देवताओंने इस मार्गका आश्रय लिया है। श्रेष्ठ पुरुष जिस मार्गसे चले हैं, उसका सभी लोग अनुसरण करते हैं ॥ ६८ ॥ कृतकृत्याश्च सायाह्ने निवासं रोचयामहे । साश्वनागरथाः सर्वे विश्रामामो नराधिपाः ॥ ६९ ॥ 'अब हमलोगोंका कार्य पूरा हो गया, अतः सायंकालके समय विश्राम करनेकी इच्छा हो रही है। राजाओ! हम सब लोग घोड़े, हाथी एवं रथसहित विश्राम करें' ॥ ६९ ॥ वासुदेववचः श्रुत्वा तदानीं पाण्डवैः सह । पञ्चाला भृशसंहृष्टा विनेदुः सिंहसंघवत् ॥ ७० ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उस समय पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल अत्यन्त प्रसन्न हुए और सिंहसमुदायके समान दहाड़ने लगे ॥ ७० ॥ ततः प्राध्मापयन् शङ्खान् पाञ्चजन्यं च माधवः । हृष्टा दुर्योधनं दृष्ट्वा निहतं पुरुषर्षभ ॥ ७१ ॥ पुरुषप्रवर! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग दुर्योधनको मारा गया देख हर्षमें भरकर अपने-अपने शंख बजाने लगे। श्रीकृष्णने पांचजन्य शंख बजाया ॥ (देवदत्तं प्रहृष्टात्मा शङ्खप्रवरमर्जुनः । अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः । प्रसन्नचित्त अर्जुनने देवदत्त नामक श्रेष्ठ शंखकी ध्वनि की। कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजय तथा भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनने पौण्ड्र नामक महान् शंख बजाया। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ धृष्टद्युम्नस्तथा जैत्रं सात्यकिर्नन्दिवर्धनम् । तेषां नादेन महता शङ्खानां भरतर्षभ ॥ आपुपूरे नभः सर्वं पृथिवी च चचाल ह ॥