महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2940, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनकुल और सहदेवने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। धृष्टद्युम्नने जैत्र और सात्यकिने नन्दिवर्धन नामक शंखकी ध्वनि फैलायी। भरतश्रेष्ठ! उन महान् शंखोंके शब्दसे सारा आकाश भर गया और धरती डोलने लगी। ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । पाण्डुसैन्येष्ववाद्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। अस्तुवन् पाण्डवानन्ये गीर्भिंश्च स्तुतिमङ्गलैः ।) तत्पश्चात् पाण्डवसेनाओंमें शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाये जाने लगे। उन सबकी मिली-जुली आवाज बड़ी भयानक जान पड़ती थी। उस समय अन्य बहुत-से मनुष्य स्तुति एवं मंगलमय वचनोंद्वारा पाण्डवोंका स्तवन करने लगे।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि कृष्णपाण्डवदुर्योधनसंवादे एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें श्रीकृष्ण, पाण्डव और दुर्योधनका संवादविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं।)