महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2952, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण! आज विजय हो जानेपर भी हमारा मन संदेहके झूलापर झूल रहा है। महाबाहु माधव! आप गान्धारी देवीके क्रोधपर तो ध्यान दीजिये ।। २३ ।। सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता । पुत्रपौत्रवधं श्रुत्वा ध्रुवं नः सम्प्रधक्ष्यति ।। २४ ।। ‘महाभागा गान्धारी प्रतिदिन उग्र तपस्यासे अपने शरीरको दुर्बल करती जा रही हैं। वे पुत्रों और पौत्रोंका वध हुआ सुनकर निश्चय ही हमें जला डालेंगी ।। २४ ।। तस्याः प्रसादनं वीर प्राप्तकालं मतं मम । कश्च तां क्रोधताम्राक्षीं पुत्रव्यसनकर्शिताम् ।। २५ ।। वीक्षितुं पुरुषः शक्तस्त्वामृते पुरुषोत्तम । ‘वीर! अब उन्हें प्रसन्न करनेका कार्य ही मुझे समयोचित जान पड़ता है। पुरुषोत्तम! आपके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो पुत्रोंके शोकसे दुर्बल हो क्रोधसे लाल आँखें करके बैठी हुई गान्धारी देवीकी ओर आँख उठाकर देख सके ।। २५ १/२ ।। तत्र मे गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव ।। २६ ।। गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः प्रशमार्थमरिंदम । ‘शत्रुओंका दमन करनेवाले माधव! इस समय क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका वहाँ जाना ही मुझे उचित जान पड़ता है ।। त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाप्ययः ।। २७ ।। हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैः कालसमीरितैः । क्षिप्रमेव महाबाहो गान्धारीं शमयिष्यसि ।। २८ ।। ‘महाबाहो! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और संहारक हैं। आप ही सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। आप युक्ति और कारणोंसे संयुक्त समयोचित वचनोंद्वारा गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर देंगे ।। २७-२८ ।। पितामहश्च भगवान् कृष्णस्तत्र भविष्यति । सर्वथा ते महाबाहो गान्धार्याः क्रोधनाशनम् ।। २९ ।। कर्तव्यं सात्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितार्थिना । ‘हमारे पितामह श्रीकृष्णद्वैपायन भगवान् व्यास भी वहीं होंगे। महाबाहो! सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरुष! आप पाण्डवोंके हितैषी हैं। आपको सब प्रकारसे गान्धारी देवीके क्रोधको शान्त कर देना चाहिये’ ।। २९ १/२ ।। धर्मराजस्य वचनं श्रुत्वा यदुकुलोद्वहः ।। ३० ।। आमन्त्र्य दारुकं प्राह रथः सज्जो विधीयताम् । धर्मराजकी यह बात सुनकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने दारुकको बुलाकर कहा—‘रथ तैयार करो’ ।। ३० १/२ ।। केशवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणोऽथ दारुकः ।। ३१ ।।