महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2953, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन्यवेदयद् रथं सज्जं केशवाय महात्मने । केशवका यह आदेश सुनकर दारुकने बड़ी उतावलीके साथ रथको सुसज्जित किया और उन महात्माको इसकी सूचना दी ॥ ३१ १/२ ॥ तं रथं यादवश्रेष्ठः समारुह्य परंतपः ॥ ३२ ॥ जगाम हास्तिनपुरं त्वरितः केशवो विभुः । शत्रुओंको संताप देनेवाले यादवश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरकी ओर चल दिये ॥ ३२ १/२ ॥ ततः प्रायान्महाराज माधवो भगवान् रथी ॥ ३३ ॥ नागसाह्वयमासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान् । महाराज! पराक्रमी भगवान् माधव उस रथपर बैठकर हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ ३३ १/२ ॥ प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादयन् ॥ ३४ ॥ विदितो धृतराष्ट्रस्य सोऽवतीर्य रथोत्तमात् । अभ्यगच्छददीनात्मा धृतराष्ट्रनिवेशनम् ॥ ३५ ॥ नगरमें प्रविष्ट होकर वीर श्रीकृष्ण अपने रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। धृतराष्ट्रको उनके आगमनकी सूचना दी गयी और वे अपने उत्तम रथसे उतरकर मनमें दीनता न लाते हुए धृतराष्ट्रके महलमें गये ॥ ३४-३५ ॥ पूर्वं चाभिगतं तत्र सोऽपश्यदृषिसत्तमम् । पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्चापि जनार्दनः ॥ ३६ ॥ अभ्यवादयदव्यग्रो गान्धारीं चापि केशवः । वहाँ उन्होंने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको पहलेसे ही उपस्थित देखा। व्यास तथा राजा धृतराष्ट्र दोनोंके चरण दबाकर जनार्दन श्रीकृष्णने बिना किसी व्यग्रताके गान्धारी देवीको प्रणाम किया ॥ ३६ १/२ ॥ ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षजः ॥ ३७ ॥ पाणिमालम्ब्य राजेन्द्र सुस्वरं प्ररुरोद ह । राजेन्द्र! तदनन्तर यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रका हाथ अपने हाथमें लेकर उन्मुक्त स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे ॥ स मुहूर्तादिवोत्सृज्य बाष्पं शोकसमुद्भवम् ॥ ३८ ॥ प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे ह्याचम्य च यथाविधि । उवाच प्रस्तुतं वाक्यं धृतराष्ट्रमरिंदमः ॥ ३९ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वृद्धस्य तव भारत । कालस्य च यथावृत्तं तत् ते सुविदितं प्रभो ॥ ४० ॥